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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म संन्यास योग

श्लोक 20

कर्म संन्यास योग · Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् | स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

English Meaning

Resting in Brahman, with steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoiceth on obtaining what is pleasant nor grieveth on obtaining what is unpleasant.

Resting in Brahman, with steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoiceth on obtaining what is pleasant nor grieveth on obtaining what is unpleasant.

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