ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म संन्यास योग

श्लोक 27

कर्म संन्यास योग · Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः | प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

English Meaning

Shutting out (all) external contacts and fixing the gaze between the eyebrows, equalising the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils.

Shutting out (all) external contacts and fixing the gaze between the eyebrows, equalising the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils.

आगे पढ़ें — कर्म संन्यास योग के सभी श्लोक · श्रीमद्भगवद्गीता