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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म संन्यास योग

श्लोक 28

कर्म संन्यास योग · Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः | विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि अपने वशमें हैं, जो मोक्ष-परायण है तथा जो इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

English Meaning

With the senses, the mind and the intellect (ever) controlled, having liberation as his supreme goal, free from desire, fear and anger the sage is verily liberated for ever.

With the senses, the mind and the intellect (ever) controlled, having liberation as his supreme goal, free from desire, fear and anger the sage is verily liberated for ever.

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