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श्रीमद्भगवद्गीता · अक्षर ब्रह्म योग

श्लोक 6

अक्षर ब्रह्म योग · Akshara Brahma Yoga

मूल पाठ

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् | तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।

English Meaning

Whosoever at the end leaves the body, thinking of any being, to that being only does he go, O son of Kunti (Arjuna), because of his constant thought of that being.

Whosoever at the end leaves the body, thinking of any being, to that being only does he go, O son of Kunti (Arjuna), because of his constant thought of that being.

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