अध्याय 23 — विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व
पूर्वभाग · Purva Bhag
विभिन्न कल्पोंमें होनेवाले सद्योजातादि शिवावतारोंका वर्णन, विभिन्न लोकोंकी स्थिति तथा महारुद्रका विश्वरूपत्व
पूर्वभाग
हिन्दी अनुवाद और व्याख्या
सूतजी बोले--ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर उनके प्रबोधनके लिये ब्रह्मरूप भगवान् शिवने मुसकराकर उनसे कहा-- ॥ १॥
जब श्वेतकल्प था, उस समय मैं श्वेत वर्णका था। मेरी श्वेत पगड़ी, श्वेत माला, श्वेत वस्त्र, श्वेत अस्थि, श्वेत रोम, श्वेत त्वचा तथा श्वेत ही मेरा रुधिर था। इसी कारणसे वह कल्प 'श्वेतकल्प' नामसे विख्यात हुआ ॥ २-३॥ उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्री भी श्वेत अंगोंवाली, श्वेत रक्तवाली तथा श्वेत वर्णवाली थीं ॥ ४॥
तदनन्तर हे देवेश! आपने अपने उग्र तपसे सद्योजातत्वको प्राप्त मुझ शिवको जाना ॥ ५॥
मेरा यह सद्योजातरूप गुह्य ब्रह्मके रूपमें जाना जाता है। अतएव गुह्यत्वको प्राप्त मुझ सद्योजात शिवको जो द्विजातिगण जानेंगे, वे मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे उनका पुनरागमन नहीं होता अर्थात् वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ १/२॥ पुनः जब मेरा नाम लोहित था, तब मेरे द्वारा धारित लोहित वर्णके कारण वह कल्प लोहितकल्प नामसे कहा गया ॥ ७ १/२॥ उस कल्पमें रक्तवर्णके मांस तथा हड्डियोंवाली, रक्तवर्णका दूध प्रदान करनेवाली, लाल आँखोंवाली तथा लाल स्तनवाली धेनुरूपमें गायत्री अधिष्ठित हुई ॥ ८ १/२॥ तदनन्तर उस धेनुके लोहितत्व, उस कल्पमें वर्णके बदल जाने तथा योगकी वामताके कारण मैं वामदेवत्वको प्राप्त हुआ अर्थात् मेरा नाम वामदेव पड़ गया ॥ ९ १/२॥ हे महासत्त्व! उस कल्पमें भी नियत आत्मावाले आपने अपने योगबलसे लोहितवर्ण-स्थित मुझ परमेश्वरको जाना और तभीसे मैं पृथ्वीलोकमें वामदेव नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हो गया ॥ १०-११॥ जो भी द्विजातिगण मेरे वामदेवरूपको जानेंगे, वे जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे रुद्रलोकमें निवास करेंगे ॥ १२॥
जब मैं युगक्रमसे पीतवर्णवाला हुआ, तब मेरे वर्णनामपर उस कल्पका नाम पीतकल्प हुआ ॥ १३॥
मेरे द्वारा उत्पन्न तथा ब्रह्म नामसे जानी जानेवाली देवेश्वरी गायत्रीका भी अंग पीला, रक्त पीला तथा वर्ण आदि सब पीला था ॥ १४॥
हे महासत्त्व! उस कल्पमें भी योगपरायण मनवाले उन द्विजातियोंने योगयुक्त चित्तसे मुझे जाना। हे कनकाण्डज! उस कल्पमें तुमने भी मुझे पुनः तत्पुरुषरूपमें जाना; उसी कारणसे मेरा यह तत्पुरुष नाम हुआ ॥ १५-१६॥ तपस्यासे युक्त, विशुद्ध मनवाले तथा ब्रह्मपरायण जो लोग मुझ रुद्र तथा वेदमाता रुद्राणी गायत्रीकी आराधना करेंगे, वे पुनर्जन्मसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे ॥ १७ १/२॥ पुनः जब मैंने भयानक कृष्णवर्ण धारण किया, तब मेरे वर्णके नामसे वह कल्प कृष्णकल्प कहा गया ॥ १८ १/२॥ हे ब्रह्मन्! उस कल्पमें भी तुमने कालसदृश, कालरूप, लोकोंके लिये महाकाल तथा घोर पराक्रमवाले मुझ घोरको जाना ॥ १९ १/२॥ हे देवेश! उस कल्पमें मुझसे उत्पन्न ब्रह्मसंज्ञावाली गायत्री भी कृष्ण अंगोंवाली, कृष्ण रक्तवाली तथा कृष्ण रूपवाली थीं ॥ २० १/२॥ अतएव इस भूतलपर जो लोग घोरत्वको प्राप्त मुझ शिवको जान लेंगे, शाश्वत रूपवाला मैं उनके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा ॥ २१ १/२॥ हे ब्रह्मन्! पुनः जब मैं विश्वरूपत्वको प्राप्त हुआ, उस समय भी आपने परम समाधिसे मुझे जाना था। उस समय समस्त लोकोंको धारण करनेवाली गायत्री भी विश्वरूपा अर्थात् अनेक वर्णोंवाली थीं ॥ २२-२३॥ इस भूतलपर जो लोग विश्वत्वको प्राप्त मुझ परमात्माको जान लेंगे, उनके प्रति मैं सदाके लिये सौम्य तथा शान्त हो जाऊँगा ॥ २४॥
इसी कारण यह कल्प विश्वरूपकल्प नामसे जाना गया और ये गायत्री विश्वरूपा नामसे कही गयीं। वे सर्वरूप थीं और ये सद्योजात आदि चार कुमार मेरे पुत्ररूपमें प्रकट हुए, जिनकी लोकमें विशेष प्रसिद्धि हुई ॥ २५-२६॥ ये गायत्री शब्द और अर्थरूपसे मेध्या अर्थात् यज्ञयोग्या होंगी, सर्वभक्षा अर्थात् पातकादिविनाशिका होंगी। गायत्रीके [सावित्रीके] सर्ववर्णा (सर्वशब्दात्मिका) होनेसे ही चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था प्रजामें व्यवस्थित होगी ॥ २७॥
इसीलिये धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष--चार प्रकारके ये पुरुषार्थ हैं और वेद भी चार हैं। जीव-समुदायोंके भी जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज--ये चार प्रकारके रूप हैं तथा आश्रम भी चार हैं। दया, दान, तप, सत्य--ये धर्मके चार पाद हैं एवं मेरे पुत्र भी चार हैं ॥ २८-२९॥ इसीलिये यह चराचर जगत् युगरूप चार अवस्थाओंवाला है और यह चतुष्पादात्मक लोक भी भेदानुसार चार रूपोंमें अवस्थित है ॥ ३०॥
भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपलोक तथा सत्यलोक--इन सबके परे विष्णुलोक स्थित है ॥ ३१॥
अष्टाक्षररूप लोक अपने-अपने स्थानपर अक्षरात्मकरूपमें विद्यमान हैं। भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक ही चार पादके रूपमें अवस्थित हैं। इनमें भूर्लोक पहला पाद है, भुवर्लोक दूसरा पाद है, स्वर्लोक तीसरा तथा महर्लोक चौथा पाद है ॥ ३२-३३॥ पाँचवाँ जनलोक, छठा तपलोक तथा पुनर्जन्मकी प्राप्ति न करनेवाले लोगोंका सत्यलोक सातवाँ लोक कहा गया है ॥ ३४॥
विष्णुलोक वह पद है, जहाँ पहुँचकर जीवका पुनः आगमन नहीं होता है। उससे भी आगे स्कन्दलोक तथा उससे भी परे पार्वतीलोक है, जो सर्वविध सिद्धियोंसे युक्त माना गया है ॥ ३५॥
रुद्रलोक उससे परे विद्यमान है। वह पद योगियोंके लिये अत्यन्त शुभकर कहा गया है। ममतारहित, अहंकारशून्य, काम-क्रोधसे विवर्जित तथा ध्यानपरायण चित्तवाले योगिजन ही उस लोकका दर्शन करेंगे ॥ ३६ १/२॥ और जो आपने चार पादोंवाली इस गायत्री (सरस्वती)-को देखा है, उसीके चार चरणोंके रूपमें चरम पदवाला विष्णुलोक, शान्त तथा उत्तम स्कन्दलोक, पार्वतीलोक एवं रुद्रलोक अवस्थित हैं। ऐसी माहात्म्ययुक्त सरस्वतीका आपने दर्शन किया है ॥ ३७-३८॥ इससे सभी पशु भी चार पैरोंवाले होंगे और इसीसे इनके चार स्तन भी होंगे। हे ब्रह्मन्! मेरे मुखसे गिरा हुआ मन्त्रयुक्त सोमरूप अमृत प्राणधारियोंका जीवन बनकर उनके स्तनोंमें निवास करेगा। इसलिये वे स्तन 'पीतस्तन' कहे जायेंगे ॥ ३९-४०॥ उसीके कारण सोममय अमृत जीवनसंज्ञावाला होगा और उनके दुग्धका श्वेतत्व उसी सोमरूपत्वके कारण होगा--ऐसे गुणोंवाले वे चतुष्पाद होंगे ॥ ४१॥
आपके द्वारा देखी गयी यह लोकभाविनी सावित्री महेश्वरी पुनः दो पादोंवाली होकर क्रियारूप धारण करेगी; जिससे सभी शुभ नर-नारी दो पादों तथा दो स्तनोंवाले होंगे ॥ ४२ १/२॥ सभी प्राणियोंको धारण करनेवाली तथा महान् शक्तिसे सम्पन्न जिस देवीका आपने दर्शन किया है; वह महेश्वरी अजा होकर जब सर्ववर्णमय विश्वरूप धारण करेगी, तब उसीसे सभी प्रजाएँ भी अनेक वर्णोंवाली होंगी ॥ ४२-४४॥ तब महातेज तथा अमोघ वीर्यवाले अज विश्वरूप धारण करेंगे और इनके मुखमें सर्वत्र अग्नि विराजमान होगी; उसी कारण सर्वव्यापी पशुरूपी अग्नि पवित्र मानी जायगी ॥ ४५ १/२॥ विशुद्ध आत्मावाले जो द्विजगण अपनी तपस्यासे ईशित्व (ईश्वरत्व) तथा वशित्व (योगसिद्धि)-में सभी जगह मुझे भी सर्वव्यापी रूपमें विराजमान देखेंगे; वे रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित होकर मानवशरीरका त्याग करके मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा ॥ ४६-४७ १/२॥ सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! शिवजीके इस प्रकार कहनेपर भगवान् ब्रह्माने प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक रुद्रसे पुनः कहा--हे भगवन्! जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आप महेश्वरको गायत्रीसहित सर्वत्र स्थित देखे तथा हे ईश्वर! आपकी एवं गायत्रीकी आराधना करे, उसे आप परमपद दें। इसपर उन शिवजीने कहा--वैसा ही होगा ॥ ४८-५०॥ इसलिये प्रभु शिवद्वारा ब्रह्माजीके प्रति कहे गये वचनके अनुसार जो विद्वान् गायत्री तथा महात्मा रुद्रका विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्मके साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है ॥ ५१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधकल्पवर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३॥
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