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श्रीलिङ्गमहापुराण · उत्तरभाग

अध्याय 35सुवर्णधेनुदानविधि

उत्तरभाग · Uttar Bhag

अध्याय 35

सुवर्णधेनुदानविधि

उत्तरभाग

सम्पूर्ण अध्याय

हिन्दी अनुवाद और व्याख्या

सनत्कुमार बोले--अब मैं आपसे हेमधेनुके दानकी विधिका वर्णन करूँगा; यह सभी पापोंका नाश करनेवाला, ग्रह तथा दुर्भिक्षका शमन करनेवाला, उपद्रवोंको शान्त करनेवाला और समस्त व्याधियोंको दूर करनेवाला है ॥ १ १/२ ॥ हजार सुवर्णमुद्राओंसे एक गौ बनानी चाहिये; अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे अथवा एक सौ स्वर्णमुद्राओंसे सभी लक्षणों तथा गुणोंसे समन्वित धेनुका निर्माण कराना चाहिये। वह गोप्रतिमा सुन्दर खुरोंवाली, दिव्य तथा सभी लक्षणोंसे युक्त होनी चाहिये ॥ २-३ १/२ ॥ हे श्रेष्ठ मुनियो! खुरोंके अग्र भागमें हीरा तथा सींगोंमें पद्मराग लगाना चाहिये और दोनों भौंहोंके मध्यमें दिव्य मोती लगाना चाहिये। वैदूर्य मणिसे स्तनोंको तथा नीलरत्नसे शुभ पुच्छको भूषित करना चाहिये। दाँतोंमें परम सुन्दर पुष्पराज लगाना चाहिये। साथ ही दस निष्क सुवर्णसे गायकी भाँति एक सुन्दर बछड़ा बनवाकर उसे सभी रत्नोंसे विभूषित करना चाहिये ॥ ४-६ १/२ ॥ तत्पश्चात्‌ सर्वतत्त्वविद्‌ पुरुषको चाहिये कि पूर्वमें बतायी गयी विधिसे निर्मित वेदिकाके मध्य मण्डल बनाकर उसके मध्यमें बछड़ेसहित धेनुको रखकर बछड़ेसहित उस गौको दो वस्त्रोंसे वेष्टित कर दे और गायत्रीमन्त्रसे बछड़ेसहित उस सुरभि गौकी पूजा करे ॥ ७-८ १/२ ॥ इसके बाद अग्निविधानसे समिधा तथा घृतसे विधिपूर्वक होम करना चाहिये; शेष कार्य पूर्वकी भाँति करना चाहिये। तत्पश्चात्‌ शिवलिङ्गको घृत आदिसे स्नान कराकर शिव-पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गौका स्पर्श करके गायत्रीमन्त्रका उच्चारणकर उस मंगलमयी धेनुको शिवको अर्पण कर देना चाहिये। हे महामते! तीस निष्क सुवर्णकी दक्षिणा भी देनी चाहिये ॥ ९-११ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हेमधेनुदानविधिनिरूपण' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥

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