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श्रीलिङ्गमहापुराण · उत्तरभाग

अध्याय 39हिरण्याश्वदानविधि

उत्तरभाग · Uttar Bhag

अध्याय 39

हिरण्याश्वदानविधि

उत्तरभाग

सम्पूर्ण अध्याय

हिन्दी अनुवाद और व्याख्या

सनत्कुमार बोले--अब मैं विजयकी प्राप्ति करानेवाले हिरण्याश्वदानकी विधि बताता हूँ; हे सुव्रत! अश्वमेधयज्ञसे भी श्रेष्ठ इस दानका वर्णन कर रहा हूँ; आप सुनें ॥ १ ॥

एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ निष्क सुवर्णसे एक अश्वका निर्माण करके उसे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त अलंकारोंसे सुशोभित, पंचकल्याणसम्पन्न (श्वेतवर्णके चारों पाद तथा श्वेतवर्णके मुखवाला) और दिव्य आकृतिवाला बनाना चाहिये। साथ ही सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त, समस्त अंगोंवाला तथा सभी प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित एक उत्तम इन्द्ररथ बनाकर उसके अग्रभागके मध्यस्थानमें सुन्दर गुणोंवाले उस अश्वको स्थापित करके उसे 'उच्चैःश्रवा' अश्व मानकर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिये ॥ २-४ १/२ ॥ उसके पूर्व दिशा भागमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको आसीन करके उन्हें इन्द्र मानकर उनकी पूजाकर पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे और वह सुवर्ण-अश्व विधिपूर्वक शिवभक्त विप्रको दे दे। अपने सामर्थ्यके अनुसार सुवर्ण-अश्व प्रदान करके आचार्यकी पूजा करे अथवा पाँच निष्क सुवर्ण प्रदान करे। तत्पश्चात् दीनों, अन्धों, असहायों, बालकों, वृद्धों, दुर्बलों तथा रोगियों और विशेषकर ब्राह्मणोंको अन्नदानके द्वारा सन्तुष्ट करे ॥ ५-८ ॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस सुवर्ण-अश्वका दान करता है, वह दीर्घकालतक इन्द्रतुल्य सुखोंका भोग करके महान् ऐश्वर्यशाली हो जाता है ॥ ९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'हिरण्याश्वदान' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥

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