अध्याय 41 — हिरण्यवृषमहादानविधि
उत्तरभाग · Uttar Bhag
हिरण्यवृषमहादानविधि
उत्तरभाग
हिन्दी अनुवाद और व्याख्या
सनत्कुमार बोले--अब मैं हिरण्यवृषके दानका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ। एक हजार सुवर्णमुद्रासे वृषभकी एक प्रतिमा बनानी चाहिये अथवा बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उसके आधेके आधे भागसे अथवा उसके भी आधेके आधे भागसे अथवा एक सौ आठ सुवर्णमुद्रासे धर्मरूपी वृषभका निर्माण करे ॥ १-२ ॥ उसके ललाटपर स्फटिकमणिका अर्धचन्द्राकार पुण्ड्र सुशोभित करे। उसका खुर चाँदीसे, ग्रीवा पद्मरागमणिसे और ककुद् गोमेदसे बनाये। तदनन्तर उसकी ग्रीवामें रत्नजटित घण्टियोंकी माला पहनाये। इसके बाद छोटी-छोटी घण्टियोंकी मालासे आवृत करके शिवकी एक मूर्ति बनाये। तत्पश्चात् पूर्वमें कही गयी रीतिसे स्थान तथा कालमें वेदिकाके ऊपर मण्डलमें उस वृषेन्द्रको पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करे ॥ ३-५ १/२ ॥ तदनन्तर उस वृषभपर आरूढ़ उन वृषध्वज शिवजीकी भक्तिपूर्वक पूजा करे। पुनः नमस्कार करके समाहितचित्त होकर वृषगायत्रीमन्त्रसे वृषेन्द्रकी पूजा करे। 'तीक्ष्णशृङ्गाय विद्महे धर्मपादाय धीमहि। तन्नो वृषः प्रचोदयात्'--इस मन्त्रसे वृषभकी विधिपूर्वक पूजा करके धर्मकी अभिवृद्धिके लिये अपने सामर्थ्यके अनुसार घृत-अन्न आदिसे हवन करे। इस प्रकार सम्यक् पूजन करके उस वृषभको शिवजीको अथवा ब्राह्मणोंको अर्पित कर दे। अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिये। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अत्युत्तम वृषदानको करता है, वह शिवका अनुचर होकर उन्हींके साथ आनन्द प्राप्त करता है ॥ ६-१० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'सुवर्णवृषदान' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
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