अध्याय 43 — लोकपालाष्टकमहादानविधि
उत्तरभाग · Uttar Bhag
लोकपालाष्टकमहादानविधि
उत्तरभाग
हिन्दी अनुवाद और व्याख्या
सनत्कुमार बोले--अब मैं लोकपालाष्टकदानका वर्णन करता हूँ; जो दिव्य, परम दुर्लभ, समस्त सम्पदाओंको प्रदान करनेवाला, गोपनीय, शत्रुके राज्यका विनाश करनेवाला, अपने देशकी रक्षा करनेवाला, प्रशस्त, हाथी-घोड़े आदिकी वृद्धि करनेवाला, पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाला, पुण्यदायक तथा गो-ब्राह्मणका कल्याण करनेवाला है ॥ १-२ ॥ पूर्वोक्त देशकालमें वेदीके ऊपर मण्डलका निर्माण करके उसके मध्यमें शिवको स्थापित करके उनकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनेके अनन्तर आठों दिशाओंमें बालुकामय स्थण्डिल बनाना चाहिये। तत्पश्चात् उन आठों वेदियोंपर नवीन वस्त्रके आसनोंपर वेदवेदांगमें पारंगत, जितेन्द्रिय, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न आठ विप्रोंको शिवाभिमुख आसीन करके उनका पूजन करे। दिव्य वस्त्रों तथा आभूषणोंसे अलंकृत करके गन्ध, पुष्प एवं उत्तम धूप-इन उपचारोंसे लोकपाल-मन्त्रोंके द्वारा उन ब्राह्मणोंकी क्रमसे पूजा करनी चाहिये ॥ ३-६ ॥ तदनन्तर पूर्वकी भाँति अग्निमें होम करना चाहिये; लोकपालमन्त्रोंके द्वारा घृत तथा समिधासे क्रमपूर्वक अग्निकार्य (हवन) करना चाहिये। इस प्रकार विधानपूर्वक हवन करके शिवभक्त आचार्यको चाहिये कि यजमानको बुलाकर उसके द्वारा सभी आभरणोंसे भूषित विप्रोंकी पूजा करवाकर उन लोकपालमन्त्रोंके द्वारा उन्हें पृथक्-पृथक् द्रव्य तथा दस निष्क सुवर्णका आभूषण दिलाये। साथ ही दस निष्क परिमाणका आसन भी प्रदान करे। वहाँ विधिपूर्वक शिवजीको स्नान कराये। तत्पश्चात् अपने सामर्थ्यके अनुसार आचार्यको दक्षिणा प्रदान करे। जो मनुष्य इस विधिसे भक्तिपूर्वक लोकपालोंका दान करता है, वह दीर्घकालतक लोकपालोंके समीप निवास करके बुद्धिमान् तथा चक्रवर्ती राजा होता है ॥ ७-११ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'लोकपालाष्टकदानविधानवर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
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