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श्रीरामचरितमानस · अरण्य काण्ड

अरण्य काण्ड दोहा 10

अरण्य काण्ड · Aranya Kaand

मूल पाठ

तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥10॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

तब मुनि ने हृदय में धीरज धरकर बार-बार चरणों को स्पर्श किया। फिर प्रभु को अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से उनकी पूजा की॥10॥

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