मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शंकरं वंदे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्री रामभूपप्रियम्॥1॥
श्रीरामचरितमानस — अरण्य काण्ड
कुल 356 पद/श्लोक
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुंदरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम्। राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे॥2॥
उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥1॥
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥2॥
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥3॥
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना॥4॥
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥ धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥1॥
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥2॥
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥3॥
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥4॥
नारद देखा बिकल जयंता। लगि दया कोमल चित संता॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥5॥
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहीं पाई॥6॥
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥7॥
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥1॥
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥2॥
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना॥1॥
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ॥2॥
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए॥ करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए॥3॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने॥ करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥4॥
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत॥3॥
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥ भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥1॥
निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं॥ प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥2॥
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥ निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥3॥
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥ मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥4॥
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥ विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥5॥
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥ भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥6॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥ पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥7॥
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥ निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांतिते गतिं स्वकं॥8॥
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥ जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥9॥
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥ स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥10॥
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥ प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥11॥
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥ व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥12॥
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥1॥
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥ कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥2॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥3॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥4॥
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥ एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥5॥
जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥6॥
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥7॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥ पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥8॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥9॥
पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥10॥
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥4॥
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥5 क॥
सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं। तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥5 ख॥
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा॥ तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना॥1॥
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू॥ धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी॥2॥
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी॥ ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे॥3॥
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई॥ जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई॥4॥
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी॥ अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा॥5॥
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर॥6 ख॥
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥ आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥1॥
उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥ सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥2॥
जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया। करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया॥ मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता॥3॥
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा॥ पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥4॥
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल॥6 क॥
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए॥ जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई॥
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥ जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥1॥
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती॥ नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥2॥
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥ तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥3॥
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥ एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥4॥
देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग। सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥7॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥1॥
रिषि निकाय मुनिबर गति देखी। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा॥2॥
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे॥ अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥3॥
जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥4॥
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम। मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्री राम॥8॥
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥1॥
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥ हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥2॥
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥3॥
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥4॥
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥5॥
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥ कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥6॥
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥7॥
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥ तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥8॥
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा॥ भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥9॥
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनिबर जैसें॥ आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥10॥
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥ भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥11॥
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥12॥
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥9॥
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी॥ महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी॥1॥
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥2॥
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥ निसिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥3॥
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं॥ हर हृदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं॥4॥
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥5॥
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं॥6॥
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥7॥
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥8॥
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥9॥
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥ जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥10॥
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए॥11॥
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउँ सो तोही॥ मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥12॥
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥13॥
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा॥14॥
तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥10॥
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥ बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥1॥
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥ देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥2॥
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥ तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥3॥
नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा॥ राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥4॥
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥ मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥5॥
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी॥ पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा॥6॥
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥7॥
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मन हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम॥11॥
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं॥ तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ॥1॥
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥ मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥2॥
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥3॥
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥4॥
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥ यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥5॥
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा॥ जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।6॥
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥7॥
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥ दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥8॥
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥ चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥9॥
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवन मानहुँ निकर चकोर॥12॥
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥ गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥1॥
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥ सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥2॥
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥ सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥ कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥
गीधराज सै भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ। गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥13॥
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥ मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥ एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥3॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥4॥
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ। जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥1॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥ भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥2॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥ प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥3॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥ श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥4॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥ गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥5॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥ काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥6॥
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥ एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥ पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥2॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥ होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥3॥
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥4॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥5॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥ गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥6॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥7॥
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥8॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥9॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥ सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥10॥
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम। तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥ खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥1॥
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥ धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥2॥
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥ सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥3॥
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥ गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥4॥
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥ धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥5॥
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥6॥
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥7॥
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥17॥
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥18॥
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी॥ सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन॥1॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई॥2॥
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा॥ देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई॥3॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई॥4॥
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं॥5॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू॥6॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥ दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ॥7॥
कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥ कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै। चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥
सावधान होइ धाए जानि सबल आराति। लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति॥19 क॥
तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥ कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥1॥
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥ भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥2॥
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥ आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥3॥
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥ छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥4॥
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥ चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥5॥
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥ नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥6॥
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥7॥
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर॥19 ख॥
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा॥ प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा॥
कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥ रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयंकर गिरा॥1॥
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥2॥
सरसक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं। करि कोप श्री रघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥ प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥3॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो। देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्यो॥4॥
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते॥ तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए॥1॥
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता॥ पंचबटीं बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक॥2॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा॥ बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी॥3॥
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥4॥
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा॥5॥
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥6॥
राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥20 क॥
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥20 ख॥
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन॥21 क॥
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई॥ कह लंकेस कहसि निज बाता। केइँ तव नासा कान निपाता॥1॥
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए॥ समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी॥2॥
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन॥ देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना॥3॥
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता॥ सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा॥4॥
रूप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी॥ तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा॥5॥
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा॥ खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता॥6॥
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ॥21 ख॥
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥ खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥1॥
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥ तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥2॥
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥ जौं नररूप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥3॥
चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ॥ इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई॥4॥
सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति। गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति॥22॥
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा॥1॥
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रूप सुबिनीता॥2॥
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना॥ दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा॥3॥
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी॥4॥
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥23॥
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥ होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥1॥