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श्रीरामचरितमानस · अरण्य काण्ड

अरण्य काण्ड दोहा 4

अरण्य काण्ड · Aranya Kaand

मूल पाठ

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥4॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मुनि ने (इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा- हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरण कमलों को कभी न छोड़े॥4॥

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