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श्रीरामचरितमानस · अयोध्या काण्ड

अयोध्या काण्ड दोहा 32

अयोध्या काण्ड · Ayodhya Kaand

मूल पाठ

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥32॥

अ
हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकूँ॥32॥

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