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श्रीरामचरितमानस · उत्तर काण्ड

उत्तर काण्ड दोहा 5

उत्तर काण्ड · Uttar Kaand

मूल पाठ

दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥ मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवतजल पुलकित गाता॥5॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

मैं दीनों के बंधु श्री रघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्‌जी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। नेत्रों से (आनंद और प्रेम के आँसुओं का) जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया॥5॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 5 उत्तर काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik