ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 3

श्रीमद्भागवतम्तृतीय स्कन्ध

कुल 33 अध्याय

अध्याय 1

उद्धव और विदुरकी भेंट

इस अध्याय में परीक्षित् मैत्रेय और विदुरके संवादके विषयमें पूछते हैं। शुकदेवजी धृतराष्ट्रके अन्याय, विदुरजीकी नीति, दुर्योधनद्वारा उनके अपमान और विदुरजीके तीर्थयात्रा-व्रतका वर्णन करते हैं। आगे विदुरजी प्रभास और सरस्वतीतटसे होते हुए यमुनातट…

8 मिनट का पाठ1,525 शब्द
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अध्याय 2

उद्धवजीद्वारा भगवान्की बाललीलाओंका वर्णन

इस अध्याय में विदुरजीके प्रश्न सुनकर उद्धवजी श्रीकृष्णके विरहमें भावविह्वल हो जाते हैं। वे भगवान्के सौन्दर्य, राजसूयमें उनके दर्शन, व्रजवासियोंपर उनके प्रभाव, देवकी-वसुदेवके प्रति विनय, शिशुपालादि योद्धाओंकी गति और श्रीकृष्णकी बाललीलाओं—पूत…

6 मिनट का पाठ1,090 शब्द
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अध्याय 3

भगवान्के अन्य लीलाचरित्रोंका वर्णन

इस अध्यायमें उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णके मथुरा-प्रवेश, कंस-वध, गुरु-दक्षिणा, रुक्मिणीहरण, सत्यासे विवाह, पारिजात-हरण, भौमासुर-वध, राजकन्याओंके विवाह, अनेक असुरों और राजाओंके संहार, युधिष्ठिरके राज्यस्थापन, परीक्षितकी रक्षा, द्वारकालीला, वैरा…

4 मिनट का पाठ767 शब्द
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अध्याय 4

उद्धवजीसे विदा होकर विदुरजीका मैत्रेय ऋषिके पास जाना

इस अध्यायमें उद्धवजी यादवोंके विनाश, भगवान् श्रीकृष्णके सरस्वतीतटपर बैठने, उद्धवको बदरिकाश्रम जानेकी आज्ञा, मैत्रेयजीके आगमन, भगवान्द्वारा उद्धवको भागवतज्ञान देने, विदुरजीके शोक-शमन तथा विदुरजीके मैत्रेय ऋषिके पास जानेका वर्णन करते हैं।

6 मिनट का पाठ1,039 शब्द
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अध्याय 5

विदुरजीका प्रश्न और मैत्रेयजीका सृष्टिक्रमवर्णन

इस अध्यायमें विदुरजी मैत्रेय मुनिसे जीवोंके कल्याण, भगवान्की लीलाओं और सृष्टिक्रमके विषयमें प्रश्न करते हैं। मैत्रेयजी विदुरजीकी प्रशंसा कर भगवान्की माया, महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्राओं, पंचभूतों और देवताओंकी प्रार्थनाओंका वर्णन आरम्भ करते हैं।

8 मिनट का पाठ1,515 शब्द
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अध्याय 6

विराट् शरीरकी उत्पत्ति

इस अध्यायमें मैत्रेय ऋषि विराट् पुरुषकी उत्पत्ति, तेईस तत्त्वोंके संगठन, विराट् शरीरमें देवताओं और इन्द्रियोंके प्रवेश, लोकोंकी रचना, वर्णोंकी उत्पत्ति तथा भगवान्की योगमायाकी अगम महिमाका वर्णन करते हैं।

5 मिनट का पाठ975 शब्द
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अध्याय 7

विदुरजीके प्रश्न

इस अध्यायमें विदुरजी भगवान्की निर्गुणता, माया, जीवके क्लेश, सृष्टिक्रम, विराट् पुरुष, प्रजापतियों, मन्वन्तरों, लोकों, जीव-योनियों, वर्णाश्रम, धर्म, योग, ज्ञान, प्रलय और भगवत्तत्त्वके विषयमें मैत्रेयजीसे अनेक प्रश्न करते हैं। मैत्रेयजी माया…

6 मिनट का पाठ1,075 शब्द
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अध्याय 8

ब्रह्माजीकी उत्पत्ति

इस अध्यायमें मैत्रेयजी विदुरजीको भागवतपुराणकी परम्परा बताते हैं और सृष्टिके पूर्व भगवान् नारायणके योगनिद्रामें शयन, नाभिकमलसे ब्रह्माजीकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीकी खोज, तप, भगवान्के दिव्य दर्शन तथा स्तुति आरम्भ करनेका वर्णन करते हैं।

6 मिनट का पाठ1,109 शब्द
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अध्याय 9

ब्रह्माजीद्वारा भगवान्की स्तुति

इस अध्यायमें ब्रह्माजी भगवान्की स्तुति करते हैं, भगवान् उनकी प्रार्थना सुनकर उन्हें तप, भागवत-ज्ञान और सृष्टिरचनाका निर्देश देते हैं तथा अंतमें अपने नारायणरूपसे अदृश्य हो जाते हैं।

8 मिनट का पाठ1,573 शब्द
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अध्याय 10

दस प्रकारकी सृष्टिका वर्णन

इस अध्यायमें विदुरजी ब्रह्माजीकी सृष्टि और कालशक्तिका प्रश्न करते हैं। मैत्रेयजी ब्रह्माजीकी तपस्या, लोकोंकी रचना, कालके निमित्तसे सृष्टि-प्रक्रिया और दस प्रकारकी सृष्टियोंका वर्णन करते हैं।

5 मिनट का पाठ882 शब्द
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अध्याय 11

मन्वन्तरादि कालविभागका वर्णन

इस अध्यायमें मैत्रेयजी परमाणुसे लेकर नाडिका, दिन-रात, पक्ष, मास, अयन, वर्ष, युग, कल्प, मन्वन्तर और ब्रह्माजीकी आयु तक कालविभागका वर्णन करते हैं। अंतमें परार्ध, पाद्मकल्प, वाराहकल्प और ब्रह्माण्डकोशकी स्थिति बतायी गयी है।

7 मिनट का पाठ1,265 शब्द
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अध्याय 12

सृष्टिका विस्तार

इस अध्यायमें ब्रह्माजीकी सृष्टि-विस्तार प्रक्रिया, अज्ञानवृत्तियोंकी रचना, सनकादि मुनियोंकी उत्पत्ति, रुद्रका प्रादुर्भाव, ब्रह्माजीके मानसपुत्रों, वेदों, उपवेदों, आश्रमवृत्तियों और स्वायम्भुव मनु-शतरूपाकी उत्पत्तिका वर्णन है।

8 मिनट का पाठ1,448 शब्द
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अध्याय 13

वाराह-अवतारकी कथा

इस अध्यायमें विदुरजी स्वायम्भुव मनुका चरित्र पूछते हैं। मनु ब्रह्माजीसे प्रजा और पृथ्वीके रहनेका स्थान माँगते हैं, ब्रह्माजीके विचार करते ही भगवान् वाराहरूपमें प्रकट होकर पृथ्वीका उद्धार करते हैं और ऋषिगण उनकी स्तुति करते हैं।

8 मिनट का पाठ1,596 शब्द
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अध्याय 14

दितिका गर्भधारण

इस अध्यायमें विदुरजी हिरण्याक्ष और वाराहभगवान्के युद्धका कारण पूछते हैं। मैत्रेयजी दिति और कश्यपजीका संवाद सुनाते हैं, जिसमें सायंकालमें दितिके आग्रह, कश्यपजीकी चेतावनी, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुके जन्मका कारण तथा उनके वंशमें भक्त प्रह्लादक…

7 मिनट का पाठ1,334 शब्द
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अध्याय 15

जय-विजयको सनकादिका शाप

इस अध्यायमें दितिके गर्भसे फैले अन्धकारके कारण देवता ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हैं। ब्रह्माजी सनकादि मुनियोंके वैकुण्ठगमन, जय-विजयद्वारा उनके रोके जाने, मुनियोंके शाप और भगवान् श्रीहरिके प्रत्यक्ष दर्शनका वर्णन करते हैं।

11 मिनट का पाठ2,092 शब्द
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अध्याय 16

जय-विजयका वैकुण्ठसे पतन

इस अध्यायमें भगवान् श्रीहरि सनकादि मुनियोंसे जय-विजयके अपराधके लिये क्षमा माँगते हैं और ब्राह्मणोंके महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं। सनकादि भगवान्की विनय और ऐश्वर्यसे आनन्दित होकर लौटते हैं, फिर भगवान् जय-विजयको शापानुसार दैत्ययोनि प्राप्त हो…

7 मिनट का पाठ1,282 शब्द
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अध्याय 17

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षका जन्म तथा हिरण्याक्षकी दिग्विजय

इस अध्यायमें दितिके गर्भसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्षके जन्मके समय हुए भयंकर उत्पातोंका वर्णन है। आगे कश्यपजी उनके नामकरण करते हैं, हिरण्यकशिपु तीनों लोकोंको वशमें करता है और हिरण्याक्ष युद्धकी खोजमें स्वर्ग तथा समुद्रमें जाकर अन्तमें वरुणसे…

5 मिनट का पाठ950 शब्द
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अध्याय 18

हिरण्याक्षके साथ वराहभगवान्का युद्ध

इस अध्यायमें हिरण्याक्षके रसातलमें पहुँचकर वराहभगवान्को चुनौती देने, भगवान्के पृथ्वीको जलसे ऊपर स्थापित करने और हिरण्याक्षसे गदायुद्ध आरम्भ होनेका वर्णन है। आगे ब्रह्माजी भगवान्से कहते हैं कि यह दैत्य देवताओं, ब्राह्मणों, गौओं और निरपराध जी…

5 मिनट का पाठ929 शब्द
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अध्याय 19

हिरण्याक्षवध

इस अध्यायमें वराहभगवान् और हिरण्याक्षके अन्तिम युद्धका वर्णन है। भगवान् सुदर्शनचक्रसे हिरण्याक्षकी मायाओंका नाश करते हैं और अन्तमें एक तमाचेसे उसका वध करते हैं। देवताओंकी स्तुति और सूतजीके द्वारा इस लीला-माहात्म्यका वर्णन भी इसी अध्यायमें है।

6 मिनट का पाठ1,155 शब्द
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अध्याय 20

ब्रह्माजीकी रची हुई अनेक प्रकारकी सृष्टिका वर्णन

इस अध्यायमें शौनकजी और विदुरजीके प्रश्नोंके उत्तरमें मैत्रेयजी ब्रह्माजीकी विविध सृष्टियोंका वर्णन करते हैं। इसमें अविद्या, यक्ष-राक्षस, देवता, असुर, संध्यादेवी, गन्धर्व-अप्सरा, भूत-पिशाच, पितृगण, सिद्ध-विद्याधर, किन्नर-किम्पुरुष, मनु और ऋष…

7 मिनट का पाठ1,355 शब्द
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अध्याय 21

कर्दमजीकी तपस्या और भगवान्का वरदान

इस अध्यायमें विदुरजी स्वायम्भुव मनुके वंश और कर्दमप्रजापतिकी सन्तानके विषयमें पूछते हैं। मैत्रेयजी कर्दमजीकी सरस्वती तटपर तपस्या, भगवान् श्रीहरिके दर्शन और वरदान, देवहूतिके साथ विवाहका संकेत तथा मनुजीके कर्दम आश्रम आगमनका वर्णन करते हैं।

8 मिनट का पाठ1,526 शब्द
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अध्याय 22

देवहूतिके साथ कर्दम प्रजापतिका विवाह

इस अध्यायमें स्वायम्भुव मनु कर्दमजीसे अपनी कन्या देवहूतिके विवाहका प्रस्ताव करते हैं। कर्दमजी देवहूतिका स्वीकार करते हैं, मनुजी कन्यादान और दहेज देकर ब्रह्मावर्त लौटते हैं तथा मैत्रेयजी मनुजीके भगवान्-विषयक जीवन और कीर्तनयोग्य चरित्रका वर्णन करते हैं।

6 मिनट का पाठ1,131 शब्द
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अध्याय 23

कर्दम और देवहूतिका विहार

इस अध्यायमें देवहूतिकी पतिसेवा, कर्दमजीकी प्रसन्नता, देवहूतिके लिये दिव्य विमानकी रचना, बिन्दुसरोवरमें उसका शृंगार, दम्पतिके दिव्य विहार, नौ कन्याओंकी उत्पत्ति और कर्दमजीके संन्याससे पहले देवहूतिकी वैराग्यपूर्ण प्रार्थना वर्णित है।

9 मिनट का पाठ1,669 शब्द
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अध्याय 24

श्रीकपिलदेवजीका जन्म

इस अध्यायमें कर्दमजी देवहूतिको भगवान् विष्णुके अवतरणका आश्वासन देते हैं। भगवान् कपिलका जन्म होता है, ब्रह्माजी उनका माहात्म्य बताकर कर्दमजीकी कन्याओंका विवाह मरीचि आदि ऋषियोंसे कराते हैं, और भगवान् कपिलकी आज्ञा लेकर कर्दमजी संन्यास ग्रहण कर…

6 मिनट का पाठ1,141 शब्द
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अध्याय 25

देवहूतिका प्रश्न तथा भगवान् कपिलद्वारा भक्तियोगकी महिमाका वर्णन

इस अध्यायमें शौनकजी भगवान् कपिलकी कथा पूछते हैं। देवहूति भगवान् कपिलसे अज्ञान, अहंता-ममता और प्रकृति-पुरुषके विषयमें प्रश्न करती हैं। भगवान् कपिल अध्यात्मयोग, मनके बन्धन-मोक्ष, साधुसंग और अहैतुकी भक्तिकी महिमा बताते हैं।

6 मिनट का पाठ1,199 शब्द
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अध्याय 26

महदादि भिन्न-भिन्न तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् कपिल देवहूतिको प्रकृति, पुरुष, काल और चौबीस तत्त्वोंका वर्णन करते हैं। महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्रा, पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ और विराट् पुरुषकी उत्पत्तिका क्रम बताया गया है तथा अन्तमें क्षेत्रज्ञ परमात्माके बिना विराट् पुर…

10 मिनट का पाठ1,873 शब्द
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अध्याय 27

प्रकृति-पुरुषके विवेकसे मोक्ष-प्राप्तिका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् कपिल प्रकृतिस्थ पुरुषके बन्धन और प्रकृति-पुरुषके विवेकसे मोक्षप्राप्तिका उपाय बताते हैं। देवहूति पूछती हैं कि नित्य प्रकृतिके रहते पुरुष कैवल्य कैसे पाता है। भगवान् निष्काम स्वधर्म, तीव्र भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, ध्यान और…

5 मिनट का पाठ813 शब्द
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अध्याय 28

अष्टांगयोगकी विधि

इस अध्यायमें भगवान् कपिल देवहूतिको अष्टांगयोगकी विधि बताते हैं। स्वधर्म, संयम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यानके क्रमसे चित्तको शुद्ध कर भगवान्के स्वरूपके अंग-प्रत्यंगका ध्यान कराया गया है। अन्तमें समाधि, अहंकारसे निवृत्ति, आत्मसाक्षा…

8 मिनट का पाठ1,478 शब्द
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अध्याय 29

भक्तिका मर्म और कालकी महिमा

इस अध्यायमें देवहूति भक्तियोग, जीवोंकी गति और कालके स्वरूपका प्रश्न करती हैं। भगवान् कपिल तामस, राजस, सात्त्विक और निर्गुण भक्तिके भेद बताते हैं, सर्वभूतस्थित परमात्माकी उपासना और समदृष्टिका उपदेश देते हैं तथा कालकी महिमा और उसके भयसे जगत्क…

6 मिनट का पाठ1,193 शब्द
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अध्याय 30

देह-गेहमें आसक्त पुरुषोंकी अधोगतिका वर्णन

इस अध्यायमें श्रीकपिलदेवजी देह, गृह, परिवार और धनमें आसक्त पुरुषकी अधोगतिका वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि काल जीवके संचित सुख-साधनोंको नष्ट करता है, कुटुम्ब-पोषणके लिये किये गये पाप मृत्युके बाद यममार्ग और नरकयातनाओंका कारण बनते हैं तथा भ…

5 मिनट का पाठ957 शब्द
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अध्याय 31

मनुष्ययोनिको प्राप्त हुए जीवकी गतिका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् कपिल मनुष्ययोनि प्राप्त करनेवाले जीवकी गर्भावस्था, जन्म, बाल्य, युवावस्था, देहाभिमान, विषयासक्ति और पुनः संसारबन्धनकी गति बताते हैं। गर्भमें जीव भगवान्की स्तुति करता है, पर जन्मके बाद स्मृति नष्ट हो जाती है। अन्तमें मुमु…

9 मिनट का पाठ1,639 शब्द
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अध्याय 32

धूममार्ग और अर्चिरादि मार्गसे जानेवालोंकी गतिका और भक्तियोगकी उत्कृष्टताका वर्णन

इस अध्यायमें भगवान् कपिल सकाम गृहस्थोंके धूममार्ग, पितृलोक और पुनर्जन्मकी गति बताते हैं तथा निष्काम धर्म, ज्ञानयोग और भक्तियोगकी श्रेष्ठता समझाते हैं। वे बताते हैं कि भगवान् वासुदेवकी भक्ति संसारसे वैराग्य और ब्रह्मसाक्षात्कार करानेवाली है,…

6 मिनट का पाठ1,063 शब्द
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अध्याय 33

देवहूतिको तत्त्वज्ञान एवं मोक्षपदकी प्राप्ति

इस अध्यायमें देवहूति भगवान् कपिलकी स्तुति करती हैं और कपिलजी उन्हें अपने सुगम अध्यात्ममार्गमें विश्वास रखनेका उपदेश देकर चले जाते हैं। इसके बाद देवहूति योगाभ्यास, वैराग्य और भगवद्भक्तिके द्वारा समाधिस्थ होकर मोक्षपद प्राप्त करती हैं। अन्तमे…

5 मिनट का पाठ986 शब्द
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