ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 4

श्रीमद्भागवतम्चतुर्थ स्कन्ध

कुल 31 अध्याय

अध्याय 1

स्वायम्भुव-मनुकी कन्या आदिके वंशका वर्णन

इस अध्यायमें स्वायम्भुव मनुकी कन्याओं और उनसे चली वंशपरम्पराओंका वर्णन है। आकूतिसे यज्ञ और दक्षिणा, देवहूतिका पूर्व प्रसंग, प्रसूतिसे दक्षकी कन्याएँ, अत्रि-अनसूया, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अथर्वा और भृगु आदि ऋषियोंकी संततिका व…

8 मिनट का पाठ1,599 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 2

भगवान् शिव और दक्ष प्रजापतिका मनोमालिन्य

इस अध्याय में विदुरजी दक्ष और भगवान् शिवके मनोमालिन्यका कारण पूछते हैं। मैत्रेयजी बताते हैं कि यज्ञसभामें दक्षको सम्मान मिला, पर भगवान् शिवके शांत बैठे रहनेसे दक्ष क्रोधित हुए और उन्होंने शिवजीको यज्ञभागसे वंचित होनेका शाप दिया। इसके उत्तरम…

5 मिनट का पाठ944 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 3

सतीका पिताके यहाँ यज्ञोत्सवमें जानेके लिये आग्रह करना

इस अध्याय में दक्षके बड़े यज्ञका वर्णन है। सती देवताओं और देवियोंको यज्ञमें जाते देखकर अपने पिताके घर जानेकी इच्छा प्रकट करती हैं। वे भगवान् शिवसे आग्रह करती हैं कि वे भी उनके साथ चलें। भगवान् शिव उन्हें समझाते हैं कि जहाँ अहंकार, द्वेष और…

5 मिनट का पाठ866 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 4

सतीका अग्निप्रवेश

इस अध्याय में सतीजी भगवान् शिवकी बात न मानकर दक्षके यज्ञमें जाती हैं। वहाँ उनका और भगवान् शिवका अपमान होता है। सती अपने पिता दक्षको भगवान् शिवकी निन्दाके लिये कठोर वचन कहती हैं और अपने पिता-जन्मसे प्राप्त शरीरका त्याग करनेका निश्चय करती हैं…

8 मिनट का पाठ1,428 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 5

वीरभद्रकृत दक्षयज्ञविध्वंस और दक्षवध

इस अध्याय में देवर्षि नारदसे सतीके देहत्याग और शिवपार्षदोंकी पराजयका समाचार सुनकर भगवान् शिव अत्यन्त क्रोधित होते हैं। वे अपनी जटासे वीरभद्रको उत्पन्न कर दक्ष और उसके यज्ञका विध्वंस करनेकी आज्ञा देते हैं। वीरभद्र शिवगणोंके साथ यज्ञमण्डपमें…

5 मिनट का पाठ904 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 6

ब्रह्मादि देवताओंका कैलास जाकर श्रीमहादेवजीको मनाना

इस अध्याय में दक्षयज्ञके विध्वंसके बाद देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाना, ब्रह्माजीका उन्हें भगवान् शिवको प्रसन्न करनेका उपदेश देना, देवताओंका कैलास जाकर शिवजीके दर्शन करना और ब्रह्माजीद्वारा शिवजीसे यज्ञके पुनरुद्धारकी प्रार्थना करना वर्णित है।

8 मिनट का पाठ1,514 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 7

दक्षयज्ञकी पूर्ति

इस अध्याय में भगवान् शिवद्वारा दक्षयज्ञके पुनरुद्धारकी अनुमति, दक्षका पुनर्जीवन और पश्चात्ताप, भगवान् विष्णुका यज्ञमें प्राकट्य, देवताओंद्वारा उनकी स्तुति तथा यज्ञकी पूर्णता और सतीजीके पार्वतीरूप जन्मका वर्णन है।

11 मिनट का पाठ2,173 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 8

ध्रुवका वन-गमन

इस अध्याय में अधर्मके वंशके संक्षिप्त वर्णनके बाद राजा उत्तानपाद, सुनीति, सुरुचि और बालक ध्रुवकी कथा आती है। सुरुचिके कठोर वचनोंसे आहत ध्रुव माताके उपदेशसे भगवान्की आराधनाके लिये निकलते हैं। नारदजी उन्हें मधुवनमें तप, ध्यान, मन्त्र-जप और भग…

12 मिनट का पाठ2,278 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 9

ध्रुवका वर पाकर घर लौटना

इस अध्याय में भगवान् विष्णुका ध्रुवजीको दर्शन देना, शंख-स्पर्शसे ध्रुवजीको दिव्य वाणी मिलना, ध्रुवजीकी स्तुति, भगवान्द्वारा ध्रुवलोकका वरदान, ध्रुवजीका पश्चात्ताप, राजा उत्तानपादद्वारा उनका स्वागत और अंततः ध्रुवजीका राज्याभिषेक वर्णित है।

11 मिनट का पाठ2,193 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 10

उत्तमका मारा जाना, ध्रुवका यक्षोंके साथ युद्ध

इस अध्याय में ध्रुवके भाई उत्तमका यक्षद्वारा मारा जाना, ध्रुवका क्रोधपूर्वक अलकापुरी जाना, यक्षोंसे उनका युद्ध, यक्षोंकी मायावी शक्ति और मुनियोंद्वारा ध्रुवके लिये मंगलकामना वर्णित है।

4 मिनट का पाठ724 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 11

स्वायम्भुव-मनुका ध्रुवजीको युद्ध बंद करनेके लिये समझाना

इस अध्याय में ध्रुवजीद्वारा नारायणास्त्र चलानेपर यक्षोंकी माया नष्ट होना, ध्रुवका युद्ध जारी रखना, स्वायम्भुव मनुका वहाँ आकर उन्हें क्रोध और हिंसासे रोकना तथा परमात्मतत्त्वका उपदेश देना वर्णित है।

6 मिनट का पाठ1,043 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 12

ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति

इस अध्याय में कुबेरका ध्रुवजीको वरदान, ध्रुवजीका भगवत्स्मृति माँगना, दीर्घकालतक राज्य करके बदरिकाश्रम जाना, भगवान् विष्णुके पार्षदोंद्वारा उन्हें विष्णुधाम ले जाना और ध्रुवचरित्रकी महिमा वर्णित है।

8 मिनट का पाठ1,474 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 13

ध्रुववंशका वर्णन, राजा अंगका चरित्र

इस अध्याय में विदुरजीके प्रश्नसे ध्रुववंशका वर्णन आरम्भ होता है। उत्कल, वत्सर और उनके वंशजोंका वर्णन करके राजा अंग और उनके दुष्ट पुत्र वेनकी कथा बतायी गयी है। अंगके अश्वमेध, पुत्रप्राप्ति और वेनके दुष्ट स्वभावसे विरक्त होकर अंगका वनगमन भी वर्णित है।

6 मिनट का पाठ1,191 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 14

राजा वेनकी कथा

इस अध्याय में अंगके वनगमनके बाद वेनका राज्याभिषेक, उसके अधर्मपूर्ण आदेश, ऋषियोंद्वारा समझानेका प्रयास, वेनका देवताओं और यज्ञका तिरस्कार, ऋषियोंद्वारा उसका वध और उसके शरीरसे निषादकी उत्पत्ति वर्णित है।

7 मिनट का पाठ1,216 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 15

महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक

इस अध्याय में राजा वेनकी भुजाओंके मन्थनसे महाराज पृथु और अर्चिका आविर्भाव, ऋषियोंद्वारा उन्हें विष्णु और लक्ष्मीका अंश बताना, पृथुका राज्याभिषेक, देवताओंसे प्राप्त उपहार और पृथुद्वारा सूत-मागध-वन्दीजनोंको अभी अपनी स्तुति न करनेका उपदेश वर्णित है।

4 मिनट का पाठ641 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 16

वन्दीजनद्वारा महाराज पृथुकी स्तुति

इस अध्याय में सूत, मागध और वन्दीजन मुनियोंकी प्रेरणासे महाराज पृथुकी स्तुति करते हैं। वे पृथुको श्रीहरिका कलावतार बताकर उनके भविष्यके धर्मपालन, प्रजारक्षण, पृथ्वी-दोहन, अश्वमेधयज्ञ, सनत्कुमारसे ज्ञानप्राप्ति और सार्वभौम राज्यका वर्णन करते हैं।

4 मिनट का पाठ765 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 17

महाराज पृथुका पृथ्वीपर कुपित होना और पृथ्वीके द्वारा उनकी स्तुति करना

इस अध्याय में विदुरजी पृथ्वी-दोहन और पृथुचरित्रके विषयमें प्रश्न करते हैं। प्रजाके अन्नाभावसे दुखी होनेपर महाराज पृथु पृथ्वीपर कुपित होकर उसे दण्ड देनेको उद्यत होते हैं। पृथ्वी गौका रूप लेकर भागती है, फिर शरणागत होकर पृथुकी स्तुति करती है औ…

6 मिनट का पाठ1,066 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 18

पृथ्वी-दोहन

इस अध्याय में पृथ्वी महाराज पृथुसे क्रोध शान्त करनेकी प्रार्थना करती है और अन्न-ओषधि प्राप्त करनेका उपाय बताती है। पृथु पृथ्वीको समतल कराते हैं, मनुको बछड़ा बनाकर धान्य दुहते हैं, और देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, दैत्य, गन्धर्व, पशु, पक्षी, वृक्…

4 मिनट का पाठ710 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 19

महाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञ

इस अध्याय में महाराज पृथुके सौ अश्वमेध यज्ञोंका वर्णन है। इन्द्र ईर्ष्यावश यज्ञका घोड़ा चुराकर पाखण्डवेष धारण करता है, पृथुपुत्र विजिताश्व घोड़ा लौटाता है, और ब्रह्माजी पृथुको यज्ञ रोककर इन्द्रसे सन्धि करनेका उपदेश देते हैं। अन्तमें पृथु यज…

6 मिनट का पाठ1,101 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 20

महाराज पृथुकी यज्ञशालामें श्रीविष्णुभगवान्का प्रादुर्भाव

इस अध्याय में भगवान् विष्णु इन्द्रके साथ महाराज पृथुके यज्ञमें प्रकट होकर उन्हें क्षमा, समता, प्रजापालन और आत्मज्ञानका उपदेश देते हैं। पृथु भगवान्के चरणोंमें प्रेमपूर्वक स्तुति करते हैं और भोग या मोक्षकी अपेक्षा भगवान्की कथा सुननेकी अभिलाषा…

7 मिनट का पाठ1,270 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 21

महाराज पृथुका अपनी प्रजाको उपदेश

इस अध्याय में महाराज पृथुके नगर-प्रवेश, विदुरजीके प्रश्न और पृथुके सभा-उपदेशका वर्णन है। पृथु प्रजाको अपने-अपने धर्मका पालन, भगवान् यज्ञपतिकी आराधना, ब्राह्मणकुलकी सेवा और प्रजापालनके धर्मका उपदेश देते हैं। अन्तमें देवता, पितर और ब्राह्मण उनकी स्तुति करते हैं।

8 मिनट का पाठ1,546 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 22

महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश

इस अध्याय में सनकादि मुनियोंके आगमन, पृथुजीके प्रश्न और सनत्कुमारजीके आत्मतत्त्व-उपदेशका वर्णन है। इसमें विषयासक्ति, वैराग्य, भक्ति, ब्रह्मनिष्ठा और पृथुजीके आदर्श गुणोंका विवेचन किया गया है।

10 मिनट का पाठ1,875 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 23

राजा पृथुकी तपस्या और परलोकगमन

इस अध्याय में महाराज पृथुके राज्यत्याग, वनगमन, तपस्या, अन्तिम योगधारणा और परलोकगमनका वर्णन है। महारानी अर्चि उनके अनुगमनमें अग्निमें प्रवेश करती हैं, देवियाँ उनकी स्तुति करती हैं और पृथुचरितके श्रवण-कीर्तनका फल बताया गया है।

6 मिनट का पाठ1,122 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 24

पृथुकी वंशपरम्परा और प्रचेताओंको भगवान् रुद्रका उपदेश

इस अध्याय में महाराज पृथुकी वंशपरम्परा, प्राचीनबर्हि और प्रचेताओंका वर्णन है। प्रचेताओंको मार्गमें भगवान् रुद्र दर्शन देते हैं, उनकी महिमा बताकर योगादेश नामका पवित्र स्तोत्र सुनाते हैं और भगवान् श्रीहरिकी आराधना करनेका उपदेश देते हैं।

13 मिनट का पाठ2,407 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 25

पुरंजनोपाख्यानका आरम्भ

इस अध्याय में प्रचेताओंकी तपस्या, नारदजीका राजा प्राचीनबर्हिको उपदेश और पुरंजनोपाख्यानका आरम्भ वर्णित है। नारदजी पुरंजन, नौ द्वारोंवाली पुरी, सुन्दरी स्त्री, सेवकों और पुरंजनके विषयासक्त जीवनका प्रतीकात्मक वर्णन करते हैं।

9 मिनट का पाठ1,712 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 26

राजा पुरंजनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना

इस अध्याय में राजा पुरंजनके शिकारके लिये वनमें जाने, निर्दोष पशुओंके वध, थककर नगर लौटने और रानीको अप्रसन्न देखकर उसे मनानेका वर्णन है। नारदजी इस कथा द्वारा विषयासक्ति, हिंसा और स्त्रीवशता से विवेकके नाशको दिखाते हैं।

4 मिनट का पाठ757 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 27

पुरंजनपुरीपर चण्डवेगकी चढ़ाई तथा कालकन्याका चरित्र

इस अध्याय में पुरंजनके विषयासक्त जीवन, उसके पुत्र-पौत्रोंमें ममता, चण्डवेग नामक गन्धर्वराजके आक्रमण और कालकन्याके चरित्रका वर्णन है। कालकन्या यवनराज भयको पति रूपमें वरण करती है और यवनराज उसे प्रज्वार तथा अपनी सेना सहित लोकोंमें विचरनेका आदेश देता है।

4 मिनट का पाठ757 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 28

पुरंजनको स्त्रीयोनिकी प्राप्ति और अविज्ञातके उपदेशसे उसका मुक्त होना

इस अध्याय में पुरंजनके यवनोंद्वारा पकड़े जाने, स्त्री-आसक्तिके कारण अगले जन्ममें विदर्भराजकी कन्या होने, मलयध्वजसे विवाह और तपश्चर्याका वर्णन है। अंतमें अविज्ञात मित्रके उपदेशसे जीवको अपने वास्तविक आत्मस्वरूपका स्मरण प्राप्त होता है।

9 मिनट का पाठ1,758 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 29

पुरंजनोपाख्यानका तात्पर्य

इस अध्याय में नारदजी पुरंजनोपाख्यानका आध्यात्मिक तात्पर्य समझाते हैं। वे पुरंजनको जीव, पुरको शरीर, अविज्ञातको ईश्वर और विभिन्न प्रतीकोंको इन्द्रिय, मन, बुद्धि, काल, कर्म तथा लिंगशरीरसे जोड़कर आत्मज्ञान, वैराग्य और श्रीहरिभक्तिका उपदेश देते हैं।

15 मिनट का पाठ2,846 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 30

प्रचेताओंको श्रीविष्णुभगवान्का वरदान

इस अध्याय में विदुरजी प्रचेताओंकी सिद्धि पूछते हैं। श्रीहरि प्रचेताओंको दर्शन देकर वरदान देते हैं, वे भगवान्की स्तुति करते हैं, और बादमें ब्रह्माजीके आदेशसे मारिषासे विवाह करके दक्षके जन्मका प्रसंग आता है।

8 मिनट का पाठ1,423 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें
अध्याय 31

प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ

इस अध्याय में प्रचेताओंका वैराग्य, नारदजीसे उनका अध्यात्मज्ञान पूछना, नारदजीका श्रीहरिभक्ति और सर्वात्मभावका उपदेश, प्रचेताओंका भगवद्धाम-प्राप्ति तथा विदुरजीके हस्तिनापुर लौटनेका वर्णन है।

6 मिनट का पाठ1,002 शब्द
पूरा अध्याय पढ़ें