ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
स्कन्ध 6

श्रीमद्भागवतम्षष्ठ स्कन्ध

कुल 19 अध्याय

अध्याय 1

अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ

इस अध्याय में राजा परीक्षित्के प्रश्नके उत्तरमें प्रायश्चित्त, तत्त्वज्ञान और भगवद्भक्तिकी महिमा बताकर अजामिलके पतन, मृत्युके समय नारायण-नाम उच्चारण और विष्णुदूतोंद्वारा यमदूतोंको रोकनेका प्रसंग आरम्भ होता है।

11 मिनट का पाठ2,018 शब्द
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अध्याय 2

विष्णुदूतोद्वारा भागवतधर्म-निरूपण और अजामिलका परमधामगमन

इस अध्याय में विष्णुदूत यमदूतोंको भागवतधर्म, भगवन्नामकी महिमा और सच्चे प्रायश्चित्तका निरूपण करते हैं। अजामिल यमदूतोंसे मुक्त होकर पश्चात्ताप, वैराग्य और भगवन्नाम-स्मरणसे अन्ततः भगवान्के परमधामको प्राप्त होता है।

8 मिनट का पाठ1,438 शब्द
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अध्याय 3

यम और यमदूतोंका संवाद

इस अध्याय में यमदूत धर्मराजसे विष्णुदूतोंके हस्तक्षेपका कारण पूछते हैं। यमराज भगवान् नारायणकी सर्वोच्च सत्ता, भागवतधर्म, भगवन्नामकी महिमा और भक्तोंको दण्डसे परे माननेका उपदेश देते हैं।

7 मिनट का पाठ1,297 शब्द
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अध्याय 4

दक्षके द्वारा भगवान्की स्तुति और भगवान्का प्रादुर्भाव

इस अध्याय में सृष्टिका विस्तार पूछनेपर प्रचेताओं, दक्षकी उत्पत्ति, दक्षकी तपस्या, हंसगुह्य स्तोत्रसे भगवान्की स्तुति, भगवान्के प्रादुर्भाव और असिक्नीसे प्रजा-वृद्धि करनेकी आज्ञाका वर्णन है।

10 मिनट का पाठ1,826 शब्द
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अध्याय 5

श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप

इस अध्याय में दक्षके हर्यश्व और शबलाश्व पुत्रोंको देवर्षि नारदके गूढ़ उपदेशसे वैराग्य प्राप्त होता है। पुत्रोंके निवृत्तिमार्गपर चले जानेसे शोकाकुल दक्ष नारदजीको लोक-लोकान्तरोंमें भटकनेका शाप देते हैं, जिसे नारदजी साधुतापूर्वक स्वीकार करते हैं।

7 मिनट का पाठ1,393 शब्द
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अध्याय 6

दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओंके वंशका विवरण

इस अध्याय में दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओं और उनसे फैली वंशपरम्पराओंका वर्णन है। धर्म, कश्यप, चन्द्र, भूत, अंगिरा, कृशाश्व तथा तार्क्ष्यको दी गयी कन्याओंसे उत्पन्न देवता, पशु-पक्षी, नाग, दानव, आदित्य और विश्वरूप आदि वंशोंका विवरण आता है।

5 मिनट का पाठ969 शब्द
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अध्याय 7

बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण

इस अध्याय में इन्द्रके ऐश्वर्यमदसे गुरु बृहस्पतिजीका अनादर, बृहस्पतिजीका देवताओंको छोड़कर अन्तर्धान होना, असुरोंके आक्रमणसे देवताओंकी पराजय और ब्रह्माजीकी सलाहसे विश्वरूपको देवगुरुके रूपमें वरण करनेका वर्णन है।

6 मिनट का पाठ1,174 शब्द
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अध्याय 8

नारायणकवचका उपदेश

इस अध्याय में विश्वरूप द्वारा देवराज इन्द्रको नारायणकवचकी विधि और उसके प्रभावका उपदेश दिया गया है। कवचमें भगवान्‌के विविध रूपों, आयुधों और पार्षदोंसे सभी दिशाओं, कालों और भयकारक स्थितियोंमें रक्षा की प्रार्थना की गयी है। अंतमें इसके धारण और…

6 मिनट का पाठ1,170 शब्द
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अध्याय 9

विश्वरूपका वध, वृत्रासुरद्वारा देवताओंकी हार और भगवान्की प्रेरणासे देवताओंका दधीचि ऋषिके पास जाना

इस अध्याय में विश्वरूपके वध, इन्द्रकी ब्रह्महत्याके चार भागोंमें विभाजन, त्वष्टाके यज्ञसे वृत्रासुरकी उत्पत्ति, देवताओंकी पराजय और भगवान्‌से उनकी स्तुति-प्रार्थना वर्णित है। भगवान्‌ प्रसन्न होकर देवताओंको दधीचि ऋषिके पास जाकर उनके शरीरसे वज…

12 मिनट का पाठ2,322 शब्द
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अध्याय 10

देवताओंद्वारा दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे वज्र-निर्माण और वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण

इस अध्याय में भगवान्‌के आदेशसे देवताओंका दधीचि ऋषिसे शरीर माँगना, दधीचिका परोपकारार्थ शरीर-त्याग, उनकी अस्थियोंसे वज्रका निर्माण और इन्द्रद्वारा देवसेनाके साथ वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण वर्णित है। अंतमें असुरोंके भागनेपर वृत्रासुर उन्हें वीर…

5 मिनट का पाठ947 शब्द
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अध्याय 11

वृत्रासुरकी वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति

इस अध्याय में वृत्रासुर भागती हुई असुरसेनाको रोकता है, देवताओंको ललकारता है और इन्द्रसे युद्ध करता है। इन्द्र और वृत्रासुरके संवादमें विश्वरूप-वध, दधीचि ऋषिके तपसे समर्थ वज्र और भगवान्‌की इच्छा पर चर्चा होती है। अंतमें वृत्रासुर भगवान्‌की अ…

6 मिनट का पाठ1,022 शब्द
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अध्याय 12

वृत्रासुरका वध

इस अध्याय में वृत्रासुर और इन्द्रके युद्धका अंतिम प्रसंग है। वृत्रासुर इन्द्रको काल, भगवान्‌की अधीनता और समभावका उपदेश देता है। इन्द्र उसके भगवद्भावकी प्रशंसा करते हैं, फिर युद्धमें वृत्रासुर इन्द्रको निगल लेता है; अन्ततः इन्द्र नारायणकवचके…

6 मिनट का पाठ1,017 शब्द
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अध्याय 13

इन्द्र पर ब्रह्महत्याका आक्रमण

इस अध्याय में वृत्रासुर-वधके बाद इन्द्रपर ब्रह्महत्याके आक्रमणका वर्णन है। ऋषि इन्द्रको अश्वमेध यज्ञके द्वारा पापसे मुक्त होनेका उपाय बताते हैं। इन्द्र ब्रह्महत्यासे बचनेके लिये मानसरोवरके कमलनालमें छिपते हैं, नहुष कुछ समय स्वर्गका शासन करत…

4 मिनट का पाठ755 शब्द
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अध्याय 14

वृत्रासुरका पूर्वचरित्र

इस अध्याय में परीक्षित्‌ वृत्रासुरकी भगवद्भक्ति पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। शुकदेवजी चित्रकेतुका पूर्वचरित्र सुनाते हैं। चित्रकेतुकी संतानहीनता, अंगिरा ऋषिका आगमन, पुत्रप्राप्ति, पुत्रपर अत्यधिक स्नेह, सौत रानियोंकी ईर्ष्या, बालकको विष देना…

10 मिनट का पाठ1,920 शब्द
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अध्याय 15

चित्रकेतुको अंगिरा और नारदजीका उपदेश

इस अध्याय में अंगिरा और नारदजी राजा चित्रकेतुको पुत्रशोकसे उबारते हैं। वे जीव, देह, सम्बन्ध, जन्म-मृत्यु और माया के अस्थिर स्वरूपका उपदेश देते हैं। अंगिरा बताते हैं कि पुत्रकी कामना देखकर उन्होंने पहले पुत्र दिया था, पर अब ज्ञान देने आये है…

5 मिनट का पाठ806 शब्द
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अध्याय 16

चित्रकेतुका वैराग्य तथा संकर्षणदेवके दर्शन

इस अध्याय में नारदजी मृत राजकुमारके जीवात्माको बुलाते हैं और जीवात्मा सम्बन्धोंकी अनित्यता बताकर चला जाता है। चित्रकेतुका शोक दूर होता है, वे यमुनातटपर क्रिया करके नारदजीसे विद्या ग्रहण करते हैं। सात दिनके अनुष्ठानसे उन्हें विद्याधरोंका आधि…

11 मिनट का पाठ2,123 शब्द
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अध्याय 17

चित्रकेतुको पार्वतीजीका शाप

इस अध्याय में चित्रकेतु भगवान्‌ शंकरको पार्वतीजीके साथ सभा में देखकर कटाक्ष करते हैं। पार्वतीजी उन्हें असुरयोनि का शाप देती हैं, जिसे चित्रकेतु विनयपूर्वक स्वीकार करते हैं। भगवान्‌ शंकर पार्वतीजीको भगवद्भक्तोंकी निर्भयता और समदृष्टिका माहात…

6 मिनट का पाठ1,082 शब्द
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अध्याय 18

अदिति और दितिकी सन्तानोंकी तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन

इस अध्याय में अदिति और दितिकी वंशपरम्परा, प्रह्लाद और बलिकी दैत्यपरम्परा तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन है। दिति इन्द्रवधके लिये पुत्र चाहती है, कश्यपजी उसे पुंसवन व्रत बताते हैं। इन्द्र कपटवेशसे दितिकी सेवा करते हुए व्रतभंगका अवसर पाकर ग…

12 मिनट का पाठ2,293 शब्द
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अध्याय 19

पुंसवन-व्रतकी विधि

इस अध्याय में परीक्षित्‌ पुंसवन-व्रतकी विधि पूछते हैं। शुकदेवजी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे आरम्भ होनेवाले इस व्रतमें लक्ष्मी-नारायणकी पूजा, आहुति, स्तुति, पति-पत्नीके आचरण, वर्षभरके नियम और उद्यापनकी विधि बताते हैं। अन्तमें इस व्रतके फलस्व…

5 मिनट का पाठ910 शब्द
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