अजामिलोपाख्यानका प्रारम्भ
इस अध्याय में राजा परीक्षित्के प्रश्नके उत्तरमें प्रायश्चित्त, तत्त्वज्ञान और भगवद्भक्तिकी महिमा बताकर अजामिलके पतन, मृत्युके समय नारायण-नाम उच्चारण और विष्णुदूतोंद्वारा यमदूतोंको रोकनेका प्रसंग आरम्भ होता है।
कुल 19 अध्याय
इस अध्याय में राजा परीक्षित्के प्रश्नके उत्तरमें प्रायश्चित्त, तत्त्वज्ञान और भगवद्भक्तिकी महिमा बताकर अजामिलके पतन, मृत्युके समय नारायण-नाम उच्चारण और विष्णुदूतोंद्वारा यमदूतोंको रोकनेका प्रसंग आरम्भ होता है।
इस अध्याय में विष्णुदूत यमदूतोंको भागवतधर्म, भगवन्नामकी महिमा और सच्चे प्रायश्चित्तका निरूपण करते हैं। अजामिल यमदूतोंसे मुक्त होकर पश्चात्ताप, वैराग्य और भगवन्नाम-स्मरणसे अन्ततः भगवान्के परमधामको प्राप्त होता है।
इस अध्याय में यमदूत धर्मराजसे विष्णुदूतोंके हस्तक्षेपका कारण पूछते हैं। यमराज भगवान् नारायणकी सर्वोच्च सत्ता, भागवतधर्म, भगवन्नामकी महिमा और भक्तोंको दण्डसे परे माननेका उपदेश देते हैं।
इस अध्याय में सृष्टिका विस्तार पूछनेपर प्रचेताओं, दक्षकी उत्पत्ति, दक्षकी तपस्या, हंसगुह्य स्तोत्रसे भगवान्की स्तुति, भगवान्के प्रादुर्भाव और असिक्नीसे प्रजा-वृद्धि करनेकी आज्ञाका वर्णन है।
इस अध्याय में दक्षके हर्यश्व और शबलाश्व पुत्रोंको देवर्षि नारदके गूढ़ उपदेशसे वैराग्य प्राप्त होता है। पुत्रोंके निवृत्तिमार्गपर चले जानेसे शोकाकुल दक्ष नारदजीको लोक-लोकान्तरोंमें भटकनेका शाप देते हैं, जिसे नारदजी साधुतापूर्वक स्वीकार करते हैं।
इस अध्याय में दक्षप्रजापतिकी साठ कन्याओं और उनसे फैली वंशपरम्पराओंका वर्णन है। धर्म, कश्यप, चन्द्र, भूत, अंगिरा, कृशाश्व तथा तार्क्ष्यको दी गयी कन्याओंसे उत्पन्न देवता, पशु-पक्षी, नाग, दानव, आदित्य और विश्वरूप आदि वंशोंका विवरण आता है।
इस अध्याय में इन्द्रके ऐश्वर्यमदसे गुरु बृहस्पतिजीका अनादर, बृहस्पतिजीका देवताओंको छोड़कर अन्तर्धान होना, असुरोंके आक्रमणसे देवताओंकी पराजय और ब्रह्माजीकी सलाहसे विश्वरूपको देवगुरुके रूपमें वरण करनेका वर्णन है।
इस अध्याय में विश्वरूप द्वारा देवराज इन्द्रको नारायणकवचकी विधि और उसके प्रभावका उपदेश दिया गया है। कवचमें भगवान्के विविध रूपों, आयुधों और पार्षदोंसे सभी दिशाओं, कालों और भयकारक स्थितियोंमें रक्षा की प्रार्थना की गयी है। अंतमें इसके धारण और…
इस अध्याय में विश्वरूपके वध, इन्द्रकी ब्रह्महत्याके चार भागोंमें विभाजन, त्वष्टाके यज्ञसे वृत्रासुरकी उत्पत्ति, देवताओंकी पराजय और भगवान्से उनकी स्तुति-प्रार्थना वर्णित है। भगवान् प्रसन्न होकर देवताओंको दधीचि ऋषिके पास जाकर उनके शरीरसे वज…
इस अध्याय में भगवान्के आदेशसे देवताओंका दधीचि ऋषिसे शरीर माँगना, दधीचिका परोपकारार्थ शरीर-त्याग, उनकी अस्थियोंसे वज्रका निर्माण और इन्द्रद्वारा देवसेनाके साथ वृत्रासुरकी सेनापर आक्रमण वर्णित है। अंतमें असुरोंके भागनेपर वृत्रासुर उन्हें वीर…
इस अध्याय में वृत्रासुर भागती हुई असुरसेनाको रोकता है, देवताओंको ललकारता है और इन्द्रसे युद्ध करता है। इन्द्र और वृत्रासुरके संवादमें विश्वरूप-वध, दधीचि ऋषिके तपसे समर्थ वज्र और भगवान्की इच्छा पर चर्चा होती है। अंतमें वृत्रासुर भगवान्की अ…
इस अध्याय में वृत्रासुर और इन्द्रके युद्धका अंतिम प्रसंग है। वृत्रासुर इन्द्रको काल, भगवान्की अधीनता और समभावका उपदेश देता है। इन्द्र उसके भगवद्भावकी प्रशंसा करते हैं, फिर युद्धमें वृत्रासुर इन्द्रको निगल लेता है; अन्ततः इन्द्र नारायणकवचके…
इस अध्याय में वृत्रासुर-वधके बाद इन्द्रपर ब्रह्महत्याके आक्रमणका वर्णन है। ऋषि इन्द्रको अश्वमेध यज्ञके द्वारा पापसे मुक्त होनेका उपाय बताते हैं। इन्द्र ब्रह्महत्यासे बचनेके लिये मानसरोवरके कमलनालमें छिपते हैं, नहुष कुछ समय स्वर्गका शासन करत…
इस अध्याय में परीक्षित् वृत्रासुरकी भगवद्भक्ति पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। शुकदेवजी चित्रकेतुका पूर्वचरित्र सुनाते हैं। चित्रकेतुकी संतानहीनता, अंगिरा ऋषिका आगमन, पुत्रप्राप्ति, पुत्रपर अत्यधिक स्नेह, सौत रानियोंकी ईर्ष्या, बालकको विष देना…
इस अध्याय में अंगिरा और नारदजी राजा चित्रकेतुको पुत्रशोकसे उबारते हैं। वे जीव, देह, सम्बन्ध, जन्म-मृत्यु और माया के अस्थिर स्वरूपका उपदेश देते हैं। अंगिरा बताते हैं कि पुत्रकी कामना देखकर उन्होंने पहले पुत्र दिया था, पर अब ज्ञान देने आये है…
इस अध्याय में नारदजी मृत राजकुमारके जीवात्माको बुलाते हैं और जीवात्मा सम्बन्धोंकी अनित्यता बताकर चला जाता है। चित्रकेतुका शोक दूर होता है, वे यमुनातटपर क्रिया करके नारदजीसे विद्या ग्रहण करते हैं। सात दिनके अनुष्ठानसे उन्हें विद्याधरोंका आधि…
इस अध्याय में चित्रकेतु भगवान् शंकरको पार्वतीजीके साथ सभा में देखकर कटाक्ष करते हैं। पार्वतीजी उन्हें असुरयोनि का शाप देती हैं, जिसे चित्रकेतु विनयपूर्वक स्वीकार करते हैं। भगवान् शंकर पार्वतीजीको भगवद्भक्तोंकी निर्भयता और समदृष्टिका माहात…
इस अध्याय में अदिति और दितिकी वंशपरम्परा, प्रह्लाद और बलिकी दैत्यपरम्परा तथा मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका वर्णन है। दिति इन्द्रवधके लिये पुत्र चाहती है, कश्यपजी उसे पुंसवन व्रत बताते हैं। इन्द्र कपटवेशसे दितिकी सेवा करते हुए व्रतभंगका अवसर पाकर ग…
इस अध्याय में परीक्षित् पुंसवन-व्रतकी विधि पूछते हैं। शुकदेवजी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदासे आरम्भ होनेवाले इस व्रतमें लक्ष्मी-नारायणकी पूजा, आहुति, स्तुति, पति-पत्नीके आचरण, वर्षभरके नियम और उद्यापनकी विधि बताते हैं। अन्तमें इस व्रतके फलस्व…