बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है?
की चेकलिस्ट
तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।
- 1'कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥' — इसमें कहा कि काव्यसम्बन्धी एक भी बातका ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागजपर लिखकर सत्य-सत्य कहता हूँ।
- 2'मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुड़इ न छाछी॥' — मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है; चाह तो अमृत पानेकी है, पर जगतमें जुड़ती छाछ भी नहीं।
- 3'करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥' — मैं श्रीरघुनाथजीके गुणोंका वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजीका चरित्र अथाह है।
- 4'मन मति रंक मनोरथ राऊ' — मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है।
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श्रेणी
रामचरितमानस — बालकाण्ड
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