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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 2 मिनट पठन

बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता

तुलसीदासजी ने बालकाण्ड में अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कई स्थानों पर स्वयं को अत्यन्त तुच्छ बताया है: 1.

संक्षिप्त उत्तर

तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।

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विस्तृत उत्तर

तुलसीदासजी ने बालकाण्ड में अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कई स्थानों पर स्वयं को अत्यन्त तुच्छ बताया है:

  1. 1'कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥' — इसमें कहा कि काव्यसम्बन्धी एक भी बातका ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागजपर लिखकर सत्य-सत्य कहता हूँ।
  1. 1'मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुड़इ न छाछी॥' — मेरी बुद्धि तो अत्यन्त नीची है और चाह बड़ी ऊँची है; चाह तो अमृत पानेकी है, पर जगतमें जुड़ती छाछ भी नहीं।
  1. 1'करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥' — मैं श्रीरघुनाथजीके गुणोंका वर्णन करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजीका चरित्र अथाह है।
  1. 1'मन मति रंक मनोरथ राऊ' — मेरे मन और बुद्धि कंगाल हैं, किन्तु मनोरथ राजा है।

इन सब में तुलसीदासजी ने अपनी बुद्धि को नीची, कंगाल और अज्ञानी बताकर गुरु, भगवान और संतों की कृपा को ही सर्वश्रेष्ठ माना।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है को संदर्भ सहित समझें

बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है का सबसे सीधा सार यह है: तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि...

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