पुरश्चरण में जप का महत्व क्या है?
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गीता (10.25): 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' पुरश्चरण में जप = प्राण (शेष चारों अंग जप-संख्या पर निर्भर)। जप = नाद-संचय (लाखों ऊर्जा-इकाइयाँ)। भाव-सहित जप > यंत्रवत् जप। एक दिन छूटे = पुरश्चरण खंडित = पुनः आरंभ। पुरश्चरण में मानस जप सर्वोत्तम।
- 1भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं: 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' यह पुरश्चरण में जप की सर्वोच्चता का शास्त्रोक्त प्रमाण है।
- 2संख्या-पूर्ति = पुरश्चरण की बाह्य पूर्णता
- 3ध्यान-सहित जप = पुरश्चरण की आंतरिक पूर्णता
- 4यदि एक दिन भी जप छूटे — पुरश्चरण खंडित माना जाता है। पुनः आरंभ करना पड़ता है। इसलिए प्रारंभ से पूर्व पर्याप्त तैयारी करें।
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