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सरल उत्तर

पुरश्चरण में जप का महत्व क्या है?

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गीता (10.25): 'सभी यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ।' पुरश्चरण में जप = प्राण (शेष चारों अंग जप-संख्या पर निर्भर)। जप = नाद-संचय (लाखों ऊर्जा-इकाइयाँ)। भाव-सहित जप > यंत्रवत् जप। एक दिन छूटे = पुरश्चरण खंडित = पुनः आरंभ। पुरश्चरण में मानस जप सर्वोत्तम।

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