लोकभागवत पुराण (११.१७.३१) में ब्रह्मचारी और महर्लोक का क्या संबंध है?भागवत ११.१७.३१ में कृष्ण कहते हैं — आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य + गहन वेदाध्ययन + निःस्वार्थ गुरु-समर्पण = मृत्यु के बाद सीधे महर्लोक। तीनों का संयोग आवश्यक है।#भागवत 11.17.31#ब्रह्मचारी#महर्लोक
मंत्र जप ज्ञानअखंड जप में कितने व्यक्ति मिलकर कर सकते हैं?न्यूनतम 2-3 (relay)। आदर्श 5-11। पारी: 24÷व्यक्ति। overlap = अखंडता। सभी = एक मंत्र/लय। अधिक = exponential। 'जहां भक्त = ईश्वर।'#अखंड#व्यक्ति
मंत्र जप ज्ञानमंत्र जप में अखंड कीर्तन का क्या महत्व है?निरंतर 24+ घंटे नाम कीर्तन। सामूहिक exponential शक्ति। 'कलौ संकीर्तनाद्येव' — कलियुग सर्वोत्तम। चैतन्य = 'हरे कृष्ण' आंदोलन। भक्तों relay। नवरात्रि/जन्माष्टमी।#अखंड#कीर्तन#जप
मंत्र जप नियमअखंड जप में बीच में विश्राम ले सकते हैं या नहीं?व्यक्तिगत: शौचालय/जल = मानस जप जारी (शरीर विश्राम)। सामूहिक: relay (पारी)। 'अखंड = ध्वनि निरंतर, व्यक्ति नहीं।' अखंड रामायण/कीर्तन = भक्त relay।#अखंड#विश्राम#बीच
अस्त्र शस्त्रकर्ण के विजय धनुष की क्या विशेषता थी?विजय धनुष अखंड और अभेद्य था। इससे चलाने वाले के चारों ओर सुरक्षा-घेरा बनता था जो पाशुपतास्त्र भी नहीं भेद सकता। इस धनुष को हाथ से छोड़ने पर ही कर्ण का वध संभव हुआ।#विजय धनुष#कर्ण#अखंड