पूजा विधि एवं कर्मकांडपूजा में वस्त्र अर्पित करने का विधानवस्त्र अर्पण षोडशोपचार का सातवाँ उपचार है। स्नान के बाद देवताओं को जनेऊ और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। 'श्री [देवता] नमः वस्त्रं समर्पयामि' मंत्र से स्वच्छ कपड़े का प्रतीकात्मक अर्पण भी स्वीकार्य है।#वस्त्र अर्पण#देवता वस्त्र#षोडशोपचार
मंदिर दानमंदिर में वस्त्र दान करने का क्या महत्व है?वस्त्र दान = महापुण्य (पद्मपुराण)। दो प्रकार: देवता को अर्पण (षोडशोपचार अंग) + निर्धन को (लज्जा-रक्षा = परम पुण्य)। नवीन-स्वच्छ दें, फटे/मैले नहीं। संक्रांति, ग्रहण, श्राद्ध — विशेष शुभ। फल: सौन्दर्य, यश, लक्ष्मी कृपा, पितर तृप्ति।
मंदिर पूजामंदिर में भगवान के वस्त्र बदलने का क्या नियम है?दैनिक 2-3 बार: प्रातः (सादे) → श्रृंगार (भव्य) → शयन (हल्के)। रेशम = सर्वोत्तम। रंग: विष्णु=पीला, शिव=श्वेत/भगवा, देवी=लाल। ऋतु अनुसार (ग्रीष्म=हल्के, शीत=ऊनी)। केवल दीक्षित पुजारी। पुराने वस्त्र = निर्माल्य (भक्तों को प्रसाद)। घर: साप्ताहिक/त्योहार पर।#वस्त्र परिवर्तन#अलंकार#श्रृंगार