शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
सुब्रह्मण्य पंचरत्नम्
द्विषड्भुजं द्वादशदिव्यनेत्रं त्रयीतनुं शूलमसिं दधानम् । शेषावतारं कमनीयरूपं ब्रह्मण्यदेवं शरणं प्रपद्ये ॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारश्लोक 3
स्वरूपद्विषड्भुज (12 भुजा वाले)
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
जिनकी 12 भुजाएँ, 12 दिव्य नेत्र हैं और जो वेदों (त्रयी) के स्वरूप हैं, उनकी मैं शरण लेता हूँ।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
दृष्टि-दोष निवारण व ज्ञान प्राप्ति
विस्तृत लाभ
दृष्टि-दोष निवारण व ज्ञान प्राप्ति।
जप काल
सायंकालीन वंदना।
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