श्री महालक्ष्मी माता की आरती: एक विस्तृत धर्मशास्त्रीय, ऐतिहासिक एवं अनुष्ठानिक शोध प्रतिवेदन
2. श्री लक्ष्मी माता की आरती (प्रामाणिक मूल पाठ)
टेक : ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ प्रथम पद: उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता। सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ द्वितीय पद: दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ तृतीय पद: तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता। कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ चतुर्थ पद: जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता। सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ पंचम पद: तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ षष्ठ पद: शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता। रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ सप्तम पद: महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता। उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥ समापन: ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥
3. ऐतिहासिक उद्गम एवं रचयिता: एक अन्वेषण
माता लक्ष्मी की आरती की उत्पत्ति भारतीय भक्ति साहित्य के इतिहास का एक जटिल और रोचक अध्याय है। जनमानस में इसे 'अपौरुषेय' (किसी मानव द्वारा न रचा गया) या अत्यंत प्राचीन माना जाता है, किन्तु साहित्यिक साक्ष्य और भाषाई विश्लेषण इसे 19वीं शताब्दी के नव-भक्ति काल से जोड़ते हैं।
3.1 'ओम जय जगदीश हरे' का संरचनात्मक प्रभाव
शोध से यह स्पष्ट होता है कि उत्तर भारत की तीन प्रमुख आरतियाँ—"ओम जय जगदीश हरे", "ओम जय शिव ओंकारा", और "ओम जय लक्ष्मी माता"—एक ही विशिष्ट छंद और धुन पर आधारित हैं। इस शैली के जनक पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (1837–1881) माने जाते हैं, जिन्होंने 1870 के दशक में पंजाब में "ओम जय जगदीश हरे" की रचना की थी। पंडित फिल्लौरी द्वारा विकसित यह छंद इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि यह उत्तर भारतीय आरती गायन का 'मानक ढांचा' बन गया। "ओम जय लक्ष्मी माता" की रचना इसी ढांचे पर बाद में की गई। भाषा शैली (खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग) यह संकेत देती है कि इसका वर्तमान स्वरूप 19वीं सदी के अंत या 20वीं सदी के प्रारंभ में स्थिर हुआ, जब हिंदी मुद्रण का विस्तार हो रहा था और धार्मिक ग्रंथों का मानकीकरण किया जा रहा था।
3.2 'स्वामी शिवानन्द' का रहस्य
इस आरती के रचयिता को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कई पुराने गुटकों और कुछ मौखिक परंपराओं में अंतिम पद में निम्नलिखित पंक्तियाँ मिलती हैं:
"महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥"
यहाँ उल्लिखित "स्वामी शिवानन्द" की पहचान को लेकर कई सिद्धांत प्रचलित हैं:
- गुजरात के स्वामी शिवानन्द (15वीं-16वीं सदी): एक प्रबल मत यह है कि यह 'शिवानन्द स्वामी' गुजरात के एक संत कवि थे, जिनका मूल नाम 'शिवानन्द वामदेव पांड्या' था। गुजरात में "जय आद्या शक्ति" आरती अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसकी संरचना लक्ष्मी आरती से मिलती-जुलती है। संभव है कि मूल गुजराती रचनाओं का हिंदी रूपांतरण करते समय उनके नाम को 'छाप' के रूप में रखा गया हो।
- काल्पनिक या सामान्य नाम: भक्ति साहित्य में अक्सर 'दास', 'सुर', 'तुलसी' या 'स्वामी' जैसे उपनामों का प्रयोग होता है। 'शिवानन्द' का शाब्दिक अर्थ 'शिव (कल्याण) में आनंद लेने वाला' भी हो सकता है, जो किसी विशिष्ट व्यक्ति की बजाय एक आध्यात्मिक अवस्था का परिचायक हो सकता है।
- ऋषिकेश के स्वामी शिवानन्द (20वीं सदी) से असंबद्धता: यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह आरती ऋषिकेश स्थित 'डिवाइन लाइफ सोसाइटी' के संस्थापक स्वामी शिवानन्द सरस्वती (1887–1963) द्वारा रचित नहीं है, क्योंकि इस आरती के प्रमाण उनके संन्यास लेने से पूर्व के साहित्य में भी मिलते हैं।
4. आरती गायन की विधि एवं श्रद्धा
आरती को श्रद्धापूर्वक गाने की एक निश्चित विधि है जो इसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है। शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार इसे निम्नलिखित रूप में संपन्न किया जाना चाहिए:
4.1 आरती की तैयारी और सामग्री
आरती के लिए एक स्वच्छ थाली (पीतल, तांबा या चांदी की) का प्रयोग करें। थाली में निम्नलिखित पंचतत्वों का होना आवश्यक है :
- पृथ्वी तत्व: पुष्प और अक्षत (चावल)।
- जल तत्व: आचमनी में जल (आरती के बाद छिड़कने के लिए)।
- अग्नि तत्व: दीपक (घी या कपूर)। गाय का घी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि यह सात्विक तरंगें उत्पन्न करता है।
- वायु तत्व: मोरपंख या चंवर (हवा करने के लिए, जो सात्विकता का प्रतीक है)।
- आकाश तत्व: घंटी और शंख की ध्वनि (जो वातावरण में नाद ब्रह्म का संचार करती है)।
5.2 गायन और वाद्य
- राग और स्वर: यद्यपि इसे किसी भी सरल धुन में गाया जा सकता है, परंतु शास्त्रीय रूप से इसे प्रायः राग बिलावल या राग कल्याण के स्वरों पर आधारित माना जाता है, जो शांति और आनंद का भाव उत्पन्न करते हैं।
- ताल और लय: आरती को मध्यम गति से प्रारंभ कर अंत में द्रुत (तेज) गति में ले जाना चाहिए। ताली बजाना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि हथेलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु दबने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और आलस्य दूर होता है।
- उच्चारण: शब्दों का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। "मैया" शब्द पर भावुकता और "हरि विष्णु विधाता" पर समर्पण का भाव होना चाहिए।
6. निष्कर्ष
"ओम जय लक्ष्मी माता" आरती केवल शब्दों का समूह नहीं है; यह भारतीय संस्कृति की उस विचारधारा का प्रतिबिम्ब है जो धन को 'पाप' नहीं, अपितु 'पुरुषार्थ' (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का एक अनिवार्य अंग मानती है।
इसका उद्गम 19वीं सदी के भक्ति पुनर्जागरण में है, इसकी परंपरा वैदिक और पौराणिक मान्यताओं का समन्वय है, और इसकी गायन विधि नाद योग और भक्ति योग का क्रियात्मक रूप है। जब एक भक्त पूर्ण श्रद्धा से "सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता" की पंक्ति गाता है, तो यह आरती एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सा बन जाती है, जो जीवन के संघर्षों में आशा और विश्वास का संचार करती है।
इस प्रकार, माता लक्ष्मी की यह आरती भौतिक समृद्धि की कामना के साथ-साथ आत्मिक शांति और मोक्ष की यात्रा का भी एक सशक्त माध्यम है।






