भाग 1: मूल संस्कृत पाठ
परंपरा और प्रश्न के अनुक्रम का पालन करते हुए, यहाँ सबसे पहले 'ब्रह्माण्ड पुराण' के अंतर्गत आने वाले 'श्रीनृसिंहकवचम्' का मूल पाठ दिया जा रहा है। यह स्तोत्र साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र का निर्माण करता है।
1.1 श्रीनृसिंहकवचम् (ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गतम्)
॥ अथ श्रीनृसिंहकवचम् ॥
विनियोगः
ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीनृसिंहकवचस्तोत्रमन्त्रस्य प्रह्लाद ऋषिः । श्रीलक्ष्मीनृसिंहो देवता । अनुष्टुप् छन्दः । ॐ नृसिंहो बीजम् । प्रह्लादकिशोरी शक्तिः । मम इष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
अथ करन्यासः
ॐ नृसिंहाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ प्रह्लादवरदाय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ भक्तवत्सलाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
अथ अङ्गन्यासः
ॐ नृसिंहाय हृदयाय नमः ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय शिरसे स्वाहा ।
ॐ प्रह्लादवरदाय शिखायै वषट् ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय कवचाय हुम् ।
ॐ भक्तवत्सलाय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय अस्त्राय फट् ।
ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ इति दिग्बन्धः ॥
ध्यानम्
नृसिंहाच्युत देवेश लक्ष्मीकान्त जगत्पते ।
अनेन कवचेनाङ्गं मदीयं रक्ष सर्वदा ॥
सर्वगोऽपि स्तम्भवासः भालं मे रक्षतु ध्वनिम् ।
नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ॥
(मूल स्तोत्र पाठ)
नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम् ॥
सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम् ।
ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम् ॥
विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम् ।
लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गं विभूतिभिरुपाश्रितम् ॥
चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम् ।
सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम् ॥
तप्तकाञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम् ।
इन्द्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः ॥
विराजितपदद्वन्द्वं शङ्खचक्रादि हेतिभिः ।
गरुत्मता च विनयात् स्तूयमानं मुदान्वितम् ॥
स्वहृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत् ।
नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः ॥
सर्वगोऽपि स्तम्भवासः भालं मे रक्षतु ध्वनिम् ।
नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः ॥
स्मृतिं मे पातु नृहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रियः ।
नासं मे सिंहनासस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः ॥
सर्वविद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनां मम ।
वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः ॥
नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभरान्तकृत् ।
दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ ॥
करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः ।
हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरिः ॥
मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्षःकुक्षिविदारणः ।
नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभि ब्रह्मसंस्तुतः ॥
ब्रह्माण्डकोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम् ।
गुह्यं मे पातु गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक् ॥
ऊरु मनोभवः पातु जानुनी नररूपधृक् ।
जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी ॥
सुरराज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम् ॥
महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः ।
महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु नैरृतौ ॥
पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः ।
नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भीषणविग्रहः ॥
ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः ।
संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेसरी ॥
इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम् ।
भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
पुत्रवान् धनवान् लोके दीर्घायुरुपजायते ।
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयः ॥
सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत् ।
भुम्यन्तरिक्षदिव्यानां ग्रहाणां विनिवारणम् ॥
वृश्चिकोरगसम्भूतविषापहरणं परम् ।
ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणम् ॥
भूर्जे वा तालपत्रे वा कवचं लिखितं शुभम् ।
करमूले धृतं येन सिध्येयुः कर्मसिद्धयः ॥
देवासुरमनुष्येषु स्वं स्वमेव जयं लभेत् ।
एकसंध्यं त्रिसंध्यं वा यः पठेन्नियतो नरः ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रः मन्त्रराज इति स्मृतः ॥
कवचं प्रपठेन्नित्यं मन्त्रराजमुदीरयेत् ।
इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे प्रह्लादोक्तं श्रीनृसिंहकवचं सम्पूर्णम् ॥
1.2 श्रीलक्ष्मीनृसिंहकरावलम्बस्तोत्रम्
श्रीमत्पयोनिधिनिकेतन चक्रपाणे
भोगीन्द्रभोगमणिरञ्जितपुण्यमूर्ते ।
योगीश शाश्वत शरण्य भवाब्धिपोत
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदर्ककिरीटकोटि-
सङ्घट्टिताङ्घ्रिकमलामलकान्तिकान्त ।
लक्ष्मीलसत्कुचसरोरुहराजहंस
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारघोरगहने चरतो मुरारे
मारोग्रभीकरमृगप्रवरार्दितस्य ।
आर्तस्य मत्सरनिदाघनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारकूपमतिघोरमगाधमूलं
सम्प्राप्य दुःखशतसर्पसमाकुलस्य ।
दीनस्य देव कृपणापदमागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारसागरविशालकरालकाल-
नक्रग्रहग्रसननिग्रहविग्रहस्य ।
व्यग्रस्य रागरसनोर्मिनिपीडितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारवृक्षमघबीजमनन्तकर्म-
शाखाशतं करणपत्रमनङ्गपुष्पम् ।
आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारसर्पघनवक्त्रभयोग्रतीव्र-
दंष्ट्राकरालविषदग्धविनष्टमूर्तेः ।
नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारदावदहनातुरभीकरोरु-
ज्वालावलीभिरतिदग्धतनूरुहस्य ।
त्वत्पादपद्मसरसीशरणागतस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारजालपतितस्य जगन्निवास
सर्वेन्द्रियार्तवडिशार्थझषोपमस्य ।
प्रोत्खण्डितप्रचुरतालुकमस्तकस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
संसारभीकरकरीन्द्रकराभिघात-
निष्पिष्टमर्मवपुषः सकलार्तिनाश ।
प्राणप्रयाणभवभीतिसमाकुलस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
अन्धस्य मे हृतविवेकमहाधनस्य
चोरैः प्रभो बलिभिरिन्द्रियनामधेयैः ।
मोहान्धकूपकुहरे विनिपातितस्य
लक्ष्मीनृसिंह मम देहि करावलम्बम् ॥
लक्ष्मीपते कमलनाभ सुरेश विष्णो
वैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष ।
ब्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव
देवेश देहि कृपणस्य करावलम्बम् ॥
यन्माययोर्जितवपुःप्रचुरप्रवाह-
मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्बम् ।
लक्ष्मीनृसिंहचरणाब्जमधुव्रतेन
स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शङ्करेण ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ लक्ष्मीनृसिंहकरावलम्बस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
भाग 2: स्तोत्र का उद्गम और ऐतिहासिक संदर्भ
नृसिंह उपासना की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसके स्रोत वेदों से लेकर पुराणों तक फैले हुए हैं।
2.1 ब्रह्माण्ड पुराण और नृसिंह कवच
• पौराणिक संदर्भ: यह कवच स्वयं भक्त प्रह्लाद द्वारा कथित है। प्रह्लाद नृसिंह अवतार के प्रत्यक्षदर्शी ही नहीं, बल्कि कारण भी थे। प्रह्लाद ने असुरों और मनुष्यों को नृसिंह उपासना का रहस्य बताया। यह कवच उसी उपदेश का हिस्सा है।
• परंपरा: यह कवच 'वैष्णव आगम' परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। दक्षिण भारत के श्रीवैष्णव और मध्व संप्रदाय में इसका नित्य पाठ अनिवार्य माना जाता है। इसे 'रक्षा-ग्रंथ' की श्रेणी में रखा गया है।
• तात्विक अर्थ: इस कवच में नृसिंह को 'सर्वगोऽपि स्तम्भवासः' (सर्वव्यापी होते हुए भी खंभे में निवास करने वाले) कहा गया है। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता का द्योतक है।
2.2 आदि शंकराचार्य और करावलम्ब स्तोत्र
• ऐतिहासिक दंतकथा (कापालिक प्रसंग): एक बार श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) के पास एक उग्र कापालिक तांत्रिक ने आदि शंकराचार्य का सिर देवी को बलि चढ़ाने की मांग की। तभी उनके शिष्य पद्मपाद (जो नृसिंह के परम भक्त थे) ने भगवान नृसिंह का आह्वान किया। नृसिंह ने पद्मपाद के शरीर में प्रवेश कर कापालिक का वध किया। इस घटना से प्रेरित होकर शंकराचार्य ने यह स्तोत्र रचा।
• अमरुक प्रसंग: एक अन्य कथा के अनुसार, जब शंकराचार्य के हाथ अग्नि से जल गए थे, तब उन्होंने भगवान नृसिंह से 'करावलम्ब' (हाथ का सहारा) मांगा, जिससे उनके हाथ पुनः स्वस्थ हो गए।
2.3 नृसिंह उपासना की वैदिक जड़ें
• ऋग्वेद: इंद्र द्वारा नमुचि राक्षस के वध की कथा, जो न गीला है न सूखा। यह हिरण्यकशिपु के वध की शर्तों का पूर्व रूप माना जाता है।
• तैत्तिरीय आरण्यक मंत्र: 'वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि। तन्नो नारसिंहः प्रचोदयात्॥'
भाग 3: श्रद्धापूर्वक पाठ की विधि
3.1 बाह्य शुद्धि और तैयारी
• स्नान और वस्त्र: स्वच्छ वस्त्र (लाल या पीले) धारण करें।
• समय (काल): सूर्यास्त का समय (प्रदोष काल) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
• दिशा: पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
3.2 न्यास विधि
| अंग | मंत्र | भाव |
| अंगूठा | ॐ नृसिंहाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः | भगवान मेरे संकल्प शक्ति में स्थित हों। |
| तर्जनी | ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय तर्जनीभ्यां नमः | भगवान मेरी दिशा निर्देश शक्ति में स्थित हों। |
| मध्यमा | ॐ प्रह्लादवरदाय मध्यमाभ्यां नमः | भगवान मेरे मध्य भाग में संतुलन बनाए रखें। |
| अनामिका | ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय अनामिकाभ्यां नमः | पवित्रता के स्थान में भगवान का वास हो। |
| कनिष्ठा | ॐ भक्तवत्सलाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः | मेरी लघुता में भी भगवान का वात्सल्य हो। |
| हथेली/पृष्ठ | ॐ लक्ष्मीनृसिंहाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः | मेरे कर्म भगवान द्वारा संचालित हों। |
3.3 दिग्बन्ध (सुरक्षा घेरा)
न्यास के बाद साधक को "ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ इति दिग्बन्धः" कहकर अपनी उंगलियों से चुटकी बजाते हुए अपने चारों ओर एक अदृश्य रेखा खींचनी चाहिए। यह मानसिक भावना करनी चाहिए कि दसों दिशाओं से भगवान नृसिंह मेरी रक्षा कर रहे हैं।
3.4 ध्यान और संकल्प
• स्वरूप: भगवान नृसिंह सिंह के मुख और मानव शरीर वाले हैं। गृहस्थों को सदैव 'लक्ष्मीनृसिंह' (शांत और सौम्य रूप) का ध्यान करना चाहिए।
3.5 पाठ की प्रक्रिया
1. सर्वप्रथम गणेश जी और गुरु का स्मरण करें.
2. भगवान नृसिंह के 'मूल मंत्र' (ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं...) का १०८ बार जाप करें.
3. इसके बाद 'श्रीनृसिंहकवचम्' का स्पष्ट उच्चारण के साथ पाठ करें.
4. अंत में 'करावलम्ब स्तोत्र' का पाठ भाव-विभोर होकर करें.
3.5 नैवेद्य
नृसिंह भगवान को 'पानकम्' (गुड़, पानी, काली मिर्च और इलायची का शरबत) बहुत प्रिय है।
निष्कर्ष
नृसिंह स्तोत्र का पाठ केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चिकित्सा है। इसकी साधना में 'विश्वास' (प्रह्लाद जैसा) और 'आत्म-समर्पण' (शंकराचार्य जैसा) मुख्य तत्व हैं। इससे न केवल भौतिक बाधाएँ (रोग, शत्रु, ऋण) नष्ट होती हैं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) का मार्ग भी प्रशस्त होता है।
॥ ॐ नमो नारसिंहाय ॥