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मातामह श्राद्ध⏱ 3 मिनट पठन

मातामह श्राद्ध क्या है?

मातामह श्राद्ध = नाना-नानी (माता के माता-पिता) का श्राद्ध, जो दौहित्र (पुत्री का पुत्र = नाती) द्वारा किया जाता है।

संक्षिप्त उत्तर

मातामह श्राद्ध = नाना-नानी (माता के माता-पिता) का श्राद्ध, जो दौहित्र (पुत्री का पुत्र = नाती) द्वारा किया जाता है। इसे 'दौहित्र श्राद्ध' भी कहते हैं। पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि इसके लिए सर्वोत्कृष्ट है। यह मातृकुल के प्रति कृतज्ञता का शास्त्रीय विधान है।

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विस्तृत उत्तर

मातामह श्राद्ध = सनातन धर्म का एक अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय श्राद्ध, जो मातृकुल (माता के वंश) के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का शास्त्रीय विधान है।

### शास्त्रीय आधार:

हिन्दू धर्मशास्त्र और पितृ यज्ञ की व्यवस्था मुख्य रूप से पितृ-सत्तात्मक (पिता के कुल) पर आधारित है। मनुष्य के तीन पूर्वज—पिता, पितामह (दादा), और प्रपितामह (परदादा)—को श्राद्ध में प्रधानता दी जाती है।

### सनातन धर्म की पूर्णता:

परंतु, सनातन धर्म की पूर्णता इस बात में है कि इसमें मातृकुल (माता के वंश) के प्रति भी असीम कृतज्ञता ज्ञापित करने का शास्त्रीय विधान है।

### मातामह श्राद्ध की पहचान:

इसी विधान को 'मातामह श्राद्ध' या 'दौहित्र श्राद्ध' कहा जाता है, जिसके लिए पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सर्वोत्कृष्ट और शास्त्र-निर्धारित माना गया है।

### दो नाम:

1मातामह श्राद्ध

  • ▸'मातामह' = नाना (माता के पिता)।

2दौहित्र श्राद्ध

  • ▸'दौहित्र' = पुत्री का पुत्र (नाती)।

### कौन कर सकता है:

यदि किसी व्यक्ति के नाना-नानी के कुल में श्राद्ध करने वाला कोई पुत्र (अर्थात् कर्ता का मामा) जीवित न हो, अथवा दौहित्र अपने मातृकुल के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना चाहता हो, तो वह प्रतिपदा तिथि को अपने नाना-नानी का श्राद्ध पूर्ण शास्त्रीय अधिकार के साथ कर सकता है।

### शास्त्रीय श्लोक (आदिपुराण और स्मृतितत्त्व):

*'मातामहानां दौहित्राः कुर्वन्त्यहनि चापरे। तेऽपि तेषां प्रकुर्वन्ति द्वितीयेऽहनि सर्वदा॥'*

अर्थ: मातामह (नाना) का श्राद्ध दौहित्र (पुत्री के पुत्र) द्वारा किया जाना शास्त्र सम्मत है और यह अनुष्ठान अत्यंत कल्याणकारी है।

### याज्ञवल्क्य स्मृति का स्पष्टीकरण:

याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के व्याख्याकारों ने यह स्पष्ट किया है कि पौत्र (पुत्र का पुत्र) और दौहित्र (पुत्री का पुत्र) दोनों समान रूप से अपने पूर्वजों को नरक से तारने की क्षमता रखते हैं।

### महत्व:

मातामह श्राद्ध = दो कुलों (पितृकुल और मातृकुल) के मध्य आध्यात्मिक सेतु का निर्माण करने वाला अद्वितीय अनुष्ठान। यह सनातन धर्म की पूर्णता और मातृकुल के प्रति कृतज्ञता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

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