विस्तृत उत्तर
दौहित्र श्राद्ध = मातामह श्राद्ध का दूसरा प्रसिद्ध नाम।
### परिचय:
इसी विधान को 'मातामह श्राद्ध' या 'दौहित्र श्राद्ध' कहा जाता है, जिसके लिए पितृ पक्ष की प्रतिपदा तिथि को सर्वोत्कृष्ट और शास्त्र-निर्धारित माना गया है।
### दौहित्र का अर्थ:
दौहित्र का अर्थ है 'पुत्री का पुत्र' (नाती)।
### श्राद्ध का स्वरूप:
- ▸नाती द्वारा अपने नाना-नानी (मातामह-मातामही) का श्राद्ध।
- ▸अर्थात् पुत्री के पुत्र द्वारा माता के माता-पिता का श्राद्ध।
### कौन कर सकता है:
दो परिस्थितियाँ
1मामा जीवित न हो
- ▸यदि नाना-नानी के कुल में श्राद्ध करने वाला कोई पुत्र (अर्थात् कर्ता का मामा) जीवित न हो।
2स्वयं की इच्छा से
- ▸अथवा दौहित्र अपने मातृकुल के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना चाहता हो।
दोनों परिस्थितियों में
- ▸वह प्रतिपदा तिथि को अपने नाना-नानी का श्राद्ध पूर्ण शास्त्रीय अधिकार के साथ कर सकता है।
### शास्त्रीय प्रमाण:
आदिपुराण और स्मृतितत्त्व
*'मातामहानां दौहित्राः कुर्वन्त्यहनि चापरे। तेऽपि तेषां प्रकुर्वन्ति द्वितीयेऽहनि सर्वदा॥'*
अर्थ: मातामह (नाना) का श्राद्ध दौहित्र (पुत्री के पुत्र) द्वारा किया जाना शास्त्र सम्मत है और यह अनुष्ठान अत्यंत कल्याणकारी है।
### दौहित्र का सामर्थ्य:
याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों के व्याख्याकारों ने यह स्पष्ट किया है कि पौत्र (पुत्र का पुत्र) और दौहित्र (पुत्री का पुत्र) दोनों समान रूप से अपने पूर्वजों को नरक से तारने की क्षमता रखते हैं।
दौहित्र द्वारा किया गया तर्पण नाना-नानी को असीम शांति प्रदान करता है।
### प्रतिपदा तिथि की भूमिका:
- ▸प्रतिपदा = दौहित्र श्राद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट और शास्त्र-निर्धारित तिथि।
- ▸अन्य कोई तिथि इस श्राद्ध के लिए इतनी उपयुक्त नहीं।
### महत्व:
दौहित्र श्राद्ध = मातृकुल के प्रति कृतज्ञता का परम अवसर, जहाँ नाती अपने नाना-नानी को असीम शांति और मुक्ति प्रदान कर सकता है।
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