विस्तृत उत्तर
स्फटिक (Rock Crystal/Clear Quartz) का श्री यंत्र अत्यंत शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। स्फटिक शुद्धता और सात्विकता का प्रतीक है। श्री यंत्र देवी त्रिपुरसुंदरी/महालक्ष्मी का यांत्रिक स्वरूप है जिसका वर्णन आदि शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी में मिलता है।
स्थापना से पूर्व
- 1शुभ मुहूर्त — दीपावली, नवरात्रि, शुक्रवार, पूर्णिमा या शुक्ल पक्ष की किसी शुभ तिथि पर स्थापित करें।
- 2प्राण प्रतिष्ठा — योग्य पंडित या श्री विद्या के दीक्षित आचार्य से प्राण प्रतिष्ठा कराना सर्वोत्तम है। बिना इसके यंत्र मात्र एक आकृति रह जाती है — ऐसी तांत्रिक मान्यता है।
स्थापना विधि
- 1शुद्धि — स्फटिक श्री यंत्र को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएं। फिर दूध और पंचामृत से स्नान कराएं।
- 1स्थान — पूजा घर में ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में या केंद्रीय स्थान पर स्थापित करें। यंत्र का मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो।
- 1आसन — लाल या पीले कपड़े पर चौकी/ताम्र पात्र पर स्थापित करें। सीधे भूमि या लकड़ी पर न रखें।
- 1पूजन:
- ▸गणपति पूजन
- ▸कलश स्थापना
- ▸श्री यंत्र पर चंदन, कुमकुम, अक्षत, पुष्प अर्पित करें
- ▸श्री सूक्त का पाठ करें
- ▸'ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः' — या सरल रूप में 'ॐ श्रीं नमः' मंत्र 108 बार जपें
- ▸घी का दीपक और धूप अर्पित करें
- 1नित्य पूजा — स्थापना के बाद प्रतिदिन कम से कम दीपक, धूप और मंत्र जप करें। श्री यंत्र की उपेक्षा न करें।
विशेष ध्यान
- ▸स्फटिक यंत्र पर दरार या खंडन न हो।
- ▸स्फटिक को सीधे धूप में लंबे समय तक न रखें (फोकस से अग्नि का खतरा)।
- ▸शुक्रवार को विशेष पूजा करें।
- ▸श्री यंत्र अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक यंत्र है — यदि संभव हो तो किसी दीक्षित गुरु के मार्गदर्शन में स्थापित करें।



