विस्तृत उत्तर
सपिण्डीकरण बारहवें या तेरहवें दिन का सबसे महत्वपूर्ण शास्त्रीय कृत्य है। इस अनुष्ठान में प्रेत के पिण्ड को उसके पूर्वजों, अर्थात पिता, पितामह और प्रपितामह के पिण्डों के साथ काटकर मिलाया जाता है। सपिण्डीकरण के बाद प्रेत अपनी पहचान, अर्थात प्रेतत्व, को त्यागकर पितरों के साथ विलीन हो जाता है। जब तक सपिण्डीकरण नहीं होता, घर में विवाह जैसे शुभ कार्य नहीं किए जा सकते और सन्यासी भी उस घर से भिक्षा ग्रहण नहीं करता। सपिण्डीकरण पूरा होते ही आत्मा आधिकारिक रूप से पितृलोक की परिधि में प्रवेश करने या यमलोक की यात्रा के लिए तत्पर हो जाती है।
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