विस्तृत उत्तर
13-दिनीय यात्रा में परिजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मृत्यु के बाद आत्मा वायुजा देह में अपने घर और परिजनों के आसपास रहती है। परिजनों को अत्यधिक विलाप से रोका गया है क्योंकि आँसू और कफ प्रेत को भक्षण करने पड़ते हैं। मृत्यु के दिन छः पिण्ड देकर शव की शुद्धि और आत्मा की शांति की जाती है। पहले दस दिनों में परिजनों द्वारा किए गए पिण्डदान से पिण्डज शरीर बनता है। ग्यारहवें और बारहवें दिन परिजनों द्वारा अन्न, जल और दीपदान से प्रेत तृप्त होता है। बारहवें या तेरहवें दिन सपिण्डीकरण से प्रेतत्व समाप्त होता है। दान, श्राद्ध, नाम-गोत्र और मंत्रों के माध्यम से भी परिजन आत्मा की यात्रा में सहायता करते हैं। जीव के कर्मों के साथ परिजनों द्वारा किए गए शास्त्र-सम्मत अन्त्येष्टि, पिण्डदान और महादान आत्मा की दुर्गति या सद्गति तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
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