विस्तृत उत्तर
मृत्यु से पहले जीव की अवस्था उसके कर्मों पर निर्भर करती है। विषयासक्त और पापी जीव के बारे में बताया गया है कि जब उसकी आयु क्षीण हो जाती है, तब वह वृद्धावस्था और व्याधियों से ग्रसित होकर शय्या पर पड़ जाता है। वह घर में मृत्यु के सम्मुख पड़ा रहता है, पर उसके भीतर वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। जब प्राण कंठ में आकर अवरुद्ध होते हैं, तब उसकी चेतना सिमट जाती है और पापी जीव के सामने यमराज के दूत प्रकट होते हैं। उन्हें देखकर वह भय से त्रस्त हो जाता है।
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