विस्तृत उत्तर
मरणोपरांत आत्मा की यात्रा में कर्मों की निर्णायक भूमिका है। मृत्यु के बाद आत्मा लिंग शरीर में पूर्वजन्म के कर्मों और संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है। यमपुरी पहुँचने पर चित्रगुप्त की अग्रसंधानी पंजिका में जीव के जन्म से मृत्यु तक के एक-एक श्वास और कर्म का लेखा प्रस्तुत होता है। धर्मराज यम इन्हीं कर्मों के आधार पर आत्मा के भाग्य का निर्णय करते हैं। सत्कर्म करने वाले जीव को स्वर्ग या उच्च लोकों में भेजा जाता है। पाप करने वाले जीव को पापों की गंभीरता के अनुसार कुम्भीपाक, रौरव आदि नरकों में यातना सहने भेजा जाता है। कर्मों का भोग पूरा होने के बाद आत्मा पुनः पृथ्वी पर नया शरीर धारण करने के लिए जन्म-मृत्यु के चक्र में लौट आती है।
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