विस्तृत उत्तर
अन्त्येष्टि आत्मा की पारलौकिक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मृत्यु के बाद आत्मा वायुजा देह में रहती है और तुरंत यमलोक नहीं जाती। मृत्यु के दिन छः प्रारंभिक पिण्ड देकर आत्मा की शांति और शव की शुद्धि की जाती है। शवदाह के समय श्मशान में शव का मस्तक उत्तर दिशा की ओर रखा जाता है और पुत्र या कर्ता पूर्व दिशा की ओर मुख करके क्रिया करता है। प्रथम दस दिनों में पिण्डदान से पिण्डज शरीर बनता है, जिसके माध्यम से आत्मा यममार्ग की यात्रा करती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन अन्न, जल और दीपदान से प्रेत तृप्त होता है। सपिण्डीकरण से प्रेतत्व समाप्त होता है। जीव के कर्म और मृत्युपरांत परिजनों द्वारा शास्त्र-सम्मत विधि से किए गए अन्त्येष्टि, पिण्डदान और महादान कर्म ही आत्मा की दुर्गति या सद्गति निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
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