विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद परिजनों के कर्म अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अन्त्येष्टि, पिण्डदान, श्राद्ध, महादान और सपिण्डीकरण आत्मा की सद्गति या दुर्गति में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। प्रथम दस दिनों के पिण्डदान से पिण्डज शरीर बनता है। ग्यारहवें और बारहवें दिन अन्न, जल और दीपदान से प्रेत तृप्त होता है। सपिण्डीकरण से प्रेतत्व समाप्त होता है। गोदान वैतरणी पार कराने में सहायक है और अन्य दान भी पारलौकिक यात्रा में मदद करते हैं। यदि विधिपूर्वक पिण्डदान न हो, तो आत्मा भूख से व्याकुल होकर वायव्य रूप में भटकती रहती है। इसलिए परिजनों द्वारा किए गए शास्त्र-सम्मत कर्म आत्मा की यात्रा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
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