विस्तृत उत्तर
13 दिन की मृत्यु क्रिया का मुख्य उद्देश्य आत्मा को पृथ्वी के भौतिक बंधनों से मुक्त कर यमराज के दरबार तक पहुँचने के लिए नई देह और चेतना प्रदान करना है। मृत्यु के क्षण आत्मा लिंग शरीर के साथ स्थूल देह से अलग होती है। मृत्यु के बाद वह वायुजा देह में रहती है। प्रथम दस दिनों के पिण्डदान से पिण्डज शरीर के अंग क्रमशः बनते हैं। दसवें दिन पूर्ण देह बनती है और भूख-प्यास जागती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन अन्न, जल और दीपदान से प्रेत तृप्त होता है। बारहवें या तेरहवें दिन सपिण्डीकरण द्वारा प्रेतत्व का निवारण होता है। तेरहवें दिन आत्मा 86,000 योजन की 348-दिनीय यमयात्रा के लिए यमदूतों द्वारा ले जाई जाती है। यह पूरी प्रक्रिया आत्मा की पारलौकिक गति को सुव्यवस्थित करती है।
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