विस्तृत उत्तर
13 दिन और 348 दिन की यात्रा एक ही पारलौकिक प्रक्रिया के दो चरण हैं। पहले 13 दिनों में आत्मा स्थूल शरीर से अलग होकर वायुजा देह में रहती है, पिण्डदान से पिण्डज शरीर प्राप्त करती है, अन्न-जल से तृप्त होती है और सपिण्डीकरण से प्रेतत्व छोड़ती है। तेरहवें दिन यमदूत उसे पाश से बाँधकर यममार्ग पर ले जाते हैं। इसके बाद 348 दिनों की यमयात्रा शुरू होती है, जिसमें आत्मा 86,000 योजन की दूरी तय कर 16 मध्यवर्ती पुरियों से गुजरती है, मासिक श्राद्ध पिण्ड ग्रहण करती है, वैतरणी नदी का सामना करती है और अंततः यमपुरी में धर्मराज यम के दरबार में पहुँचती है।
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