विस्तृत उत्तर
13-दिनीय यात्रा में आत्मा को पिण्डज शरीर प्राप्त होता है। मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा वायुजा देह में रहती है, जो कर्म करने में अक्षम होती है। प्रथम दस दिनों में दशगात्र पिण्डदान से पिण्डज शरीर का निर्माण होता है। पहले दिन सिर, दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन हृदय और वक्षस्थल, चौथे दिन पीठ, पाँचवें दिन नाभि, छठे दिन कटि और गुह्यांग, सातवें दिन जांघें, आठवें दिन घुटने, नौवें दिन पैर और दसवें दिन पूर्ण देह बनती है। यही नई देह आत्मा को यममार्ग के शुभ-अशुभ फल और यातनाएँ अनुभव करने योग्य बनाती है। यदि जीव पापी है, तो यही पिण्डज शरीर आगे यातना देह में परिवर्तित हो सकता है।
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