विस्तृत उत्तर
पिण्डदान आत्मा की सद्गति में अत्यंत सहायक है क्योंकि मृत्यु के बाद प्रथम दस दिनों में पिण्डदान से प्रेत का पिण्डज शरीर बनता है। यदि दस दिनों तक विधिपूर्वक पिण्डदान से प्रेत को तृप्त नहीं किया जाता, तो आत्मा भूख से व्याकुल होकर बिना अन्न-जल के अनंत काल तक आकाश में वायव्य रूप में भटकती रहती है। पिण्ड के प्रथम और द्वितीय भाग पिण्डज शरीर के अंग बनाते हैं, तृतीय भाग यमदूतों को संतुष्ट करता है और चतुर्थ भाग प्रेत को क्षुधा-शांति तथा शरीर-निर्माण सहने की ऊर्जा देता है। इसी नवीन निर्मित देह से आत्मा यममार्ग के शुभ-अशुभ फलों और यातनाओं को अनुभव करती है। इसलिए पिण्डदान आत्मा को वायव्य भटकाव से बचाकर आगे की यात्रा के लिए देह और तृप्ति देता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक