विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा को विस्तार से बताया गया है। मृत्यु के बाद आत्मा तत्काल वायुजा देह धारण करती है। यह देह कर्म करने में अक्षम होती है और आत्मा वायुमंडल में बिना आधार के विचरण करती है। आत्मा स्थूल अन्न ग्रहण नहीं कर सकती, लेकिन उसमें भूख और प्यास रहती है। मृत्यु के बाद वह अपने पूर्व निवास, शरीर और परिजनों के आसपास भटकती है। प्रथम दस दिनों में पिण्डदान द्वारा पिण्डज शरीर का निर्माण होता है। दसवें दिन शरीर पूर्ण होने पर भूख-प्यास जाग्रत होती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन दिए गए अन्न, जल और दीपदान से वह तृप्त होती है। सपिण्डीकरण के बाद प्रेतत्व समाप्त होता है। तेरहवें दिन यमदूत उसे पाश से बाँधकर यममार्ग पर ले जाते हैं। पृथ्वी से यमलोक की दूरी 86,000 योजन बताई गई है और आत्मा 348 दिनों में यमपुरी पहुँचती है।
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