विस्तृत उत्तर
मृत्यु के बाद आत्मा की 13-दिनीय यात्रा सनातन धर्मशास्त्रों में एक सुव्यवस्थित पारलौकिक प्रक्रिया के रूप में बताई गई है। मृत्यु के क्षण आत्मा स्थूल शरीर को छोड़कर लिंग शरीर में आवेष्टित होती है। इसके बाद वह वायुजा देह प्राप्त करती है और अपने पूर्व निवास, शरीर और परिजनों के आसपास रहती है। पहले दस दिनों में परिजनों द्वारा किए गए पिण्डदान से उसके लिए पिण्डज शरीर का क्रमिक निर्माण होता है। पहले दिन सिर, दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन हृदय और वक्षस्थल, चौथे दिन पीठ, पाँचवें दिन नाभि, छठे दिन कटि और गुह्यांग, सातवें दिन जांघें, आठवें दिन घुटने, नौवें दिन पैर और दसवें दिन पूर्ण देह का निर्माण होता है। ग्यारहवें और बारहवें दिन प्रेत को अन्न, जल और दीपदान से तृप्त किया जाता है। बारहवें या तेरहवें दिन सपिण्डीकरण द्वारा प्रेतत्व का अंत होता है। तेरहवें दिन यमदूत आत्मा को गले में पाश से बाँधकर यममार्ग की ओर ले जाते हैं। इसके बाद 86,000 योजन की यमयात्रा आरंभ होती है, जिसे पूरा करने में 348 दिन लगते हैं।
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