विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध में विषयासक्त और पापी जीव की मरणासन्न अवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जब जीव की आयु क्षीण हो जाती है, तब वह वृद्धावस्था और व्याधियों से ग्रसित होकर शय्या पर पड़ा रहता है। वह उन्हीं लोगों के द्वारा पाला जाता है जिनका उसने जीवन में भरण-पोषण किया था। वृद्धावस्था के कारण उसका शरीर कुरूप हो जाता है और वह घर में मृत्यु के सम्मुख पड़ा रहता है, फिर भी उसके भीतर वैराग्य उत्पन्न नहीं होता। इस अवस्था में वह विषयासक्ति और मोह के कारण मृत्यु सामने होने पर भी वैराग्य को प्राप्त नहीं करता।
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