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श्रीमद्भगवद्गीता · विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 48

विश्वरूप दर्शन योग · Vishwarupa Darshana Yoga

मूल पाठ

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः | एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे कुरुप्रवीर! मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे, न यज्ञोंके अनुष्ठानसे, न दानसे, न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे कुरुप्रवीर! मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे, न यज्ञोंके अनुष्ठानसे, न दानसे, न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।

English Meaning

Neither by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts nor by rituals nor by severe austerities can I be seen in this form in the world of men by any other than thyself, O great hero of the Kurus (Arjuna).

Neither by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts nor by rituals nor by severe austerities can I be seen in this form in the world of men by any other than thyself, O great hero of the Kurus (Arjuna).

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