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श्रीमद्भगवद्गीता · विश्वरूप दर्शन योग

श्लोक 55

विश्वरूप दर्शन योग · Vishwarupa Darshana Yoga

मूल पाठ

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः | निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे पाण्डवन ! जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है, वह भक्त मेरेको प्राप्त होता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे पाण्डवन ! जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला, मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है, वह भक्त मेरेको प्राप्त होता है।

English Meaning

He who does all actions for Me, who looks upon Me as the Supreme, who is devoted to Me, who is free from attachment, who bears enmity towards no creature, he comes to Me, O Arjuna.

He who does all actions for Me, who looks upon Me as the Supreme, who is devoted to Me, who is free from attachment, who bears enmity towards no creature, he comes to Me, O Arjuna.

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