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श्रीमद्भगवद्गीता · पुरुषोत्तम योग

श्लोक 17

पुरुषोत्तम योग · Purushottama Yoga

मूल पाठ

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः | यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।

English Meaning

But distinct is the Supreme Purusha called the highest Self, the indestructible Lord Who, pervading the three worlds, sustains them.

But distinct is the Supreme Purusha called the highest Self, the indestructible Lord Who, pervading the three worlds, sustains them.

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