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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 31

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

अपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।

English Meaning

Further, having regard to thy duty, shouldst not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

Further, having regard to thy duty, shouldst not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

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