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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म योग

श्लोक 31

कर्म योग · Karma Yoga

मूल पाठ

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

English Meaning

Those men who constantly practise this teaching of Mine with faith and without cavilling, they too are freed from actions.

Those men who constantly practise this teaching of Mine with faith and without cavilling, they too are freed from actions.

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