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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 30

ज्ञान कर्म संन्यास योग · Jnana Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति | सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

English Meaning

Others who regulate their diet offer life-breaths in life-breaths. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed by sacrifice.

Others who regulate their diet offer life-breaths in life-breaths. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed by sacrifice.

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