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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 38

ज्ञान कर्म संन्यास योग · Jnana Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते | तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।

English Meaning

Verily, there is no purifier in this world like knowledge. He who is perfected in Yoga finds it in the Self in time.

Verily, there is no purifier in this world like knowledge. He who is perfected in Yoga finds it in the Self in time.

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