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श्रीमद्भगवद्गीता · ज्ञान कर्म संन्यास योग

श्लोक 41

ज्ञान कर्म संन्यास योग · Jnana Karma Sanyasa Yoga

मूल पाठ

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् | आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे धनञ्जय! योग- (समता-) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे धनञ्जय! योग- (समता-) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।

English Meaning

He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are rent asunder by knowledge, and who is self-possessed actions do not bind him, O Arjuna.

He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are rent asunder by knowledge, and who is self-possessed actions do not bind him, O Arjuna.

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